'सिर्फ दिल्ली में आदेश पारित होना रिट क्षेत्राधिकार के लिए पर्याप्त नहीं': निवारक हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार
Praveen Mishra
14 Jan 2026 3:18 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने नशीले पदार्थों के अवैध व्यापार की रोकथाम अधिनियम, 1988 (PITNDPS Act) के तहत पारित एक निवारक हिरासत आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि भले ही उसके पास क्षेत्राधिकार (territorial jurisdiction) है, लेकिन यह मामला सुनने के लिए वह उपयुक्त मंच (forum conveniens) नहीं है।
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस मनोज जैन की खंडपीठ ने कहा कि हिरासत आदेश दिल्ली में पारित किया गया था, लेकिन जिन आपराधिक मामलों के आधार पर यह हिरासत दी गई है, वे पश्चिम बंगाल में लंबित हैं। इसलिए सभी प्रासंगिक रिकॉर्ड भी वहीं मौजूद हैं।
कोर्ट ने कहा—
“हालांकि हिरासत आदेश दिल्ली में पारित हुआ है, इसलिए इस न्यायालय के पास अधिकार क्षेत्र है, लेकिन प्रश्न अधिकार क्षेत्र के अस्तित्व का नहीं बल्कि उसके प्रयोग का है। 'फोरम कन्वीनियंस' के सिद्धांत के अनुसार, क्या इस न्यायालय को इस याचिका पर सुनवाई करनी चाहिए या नहीं, यही असली मुद्दा है।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह याचिका एक बंदी (detenu) की पत्नी द्वारा दायर की गई थी, जिसमें 20 मार्च 2025 को पारित हिरासत आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी। केंद्र सरकार ने प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए कहा कि बंदी के खिलाफ दर्ज सभी मूल आपराधिक मामले (predicate offences) पश्चिम बंगाल में हैं, वहीं से हिरासत का प्रस्ताव आया और सभी दस्तावेज भी वहीं उपलब्ध हैं।
सरकार ने दलील दी कि केवल इस आधार पर कि हिरासत आदेश और बंदी की अभ्यावेदन (representation) को खारिज करने के आदेश दिल्ली में जारी हुए हैं, दिल्ली हाईकोर्ट को इस मामले में अधिकार क्षेत्र का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि चूंकि कारण-ए-कार्य (cause of action) का कुछ हिस्सा दिल्ली में उत्पन्न हुआ है, इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका बनाए रखने योग्य है।
हाईकोर्ट का निर्णय
कोर्ट ने माना कि दिल्ली हाईकोर्ट के पास तकनीकी रूप से अधिकार क्षेत्र है, लेकिन चूंकि सभी महत्वपूर्ण तथ्य, रिकॉर्ड और आपराधिक मामले पश्चिम बंगाल से जुड़े हैं, इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट इस विवाद को सुनने के लिए उचित मंच नहीं है।
कोर्ट ने कहा—
“याचिकाकर्ता यह बताने में विफल रहा है कि इस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का सहारा लेने का कोई ठोस कारण क्या है।”
कोर्ट ने यह भी दोहराया कि अनुच्छेद 226(2) केवल एक सक्षम प्रावधान (enabling provision) है, जो हाईकोर्ट को अधिकार देता है, लेकिन यह बाध्य नहीं करता कि वह हर याचिका सुने, केवल इसलिए कि कारण-ए-कार्य का कोई छोटा हिस्सा उसके क्षेत्र में उत्पन्न हुआ हो।
अंततः, दिल्ली हाईकोर्ट ने अपनी विवेकाधीन रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने से इनकार कर दिया और याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता को उपयुक्त मंच पर जाने की स्वतंत्रता प्रदान की।

