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सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat
15 May 2022 6:30 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
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सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (9 मई 2022 से 13 मई 2022 तक ) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग द्वारा पारित किसी आदेश को हाईकोर्ट के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत रिट याचिका में चुनौती दी जा सकती है : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 58 (1) (ए) (iii) के तहत अपील में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (National Consumer Disputes Redressal Commission) (NCDRC) द्वारा पारित किसी आदेश को हाईकोर्ट के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर एक रिट याचिका में चुनौती दी जा सकती है।

जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि एनसीआरडीसी अनुच्छेद 227 के तहत आने वाला एक "ट्रिब्यूनल" है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रश्न में एनसीडीआरसी के आदेश के खिलाफ दायर अनुच्छेद 227 याचिका को सुनवाई योग्य माना गया। ( इबरत फैजान बनाम ओमेक्स बिल्डहोम प्राइवेट लिमिटेड)

केस: इबरत फैजान बनाम ओमेक्स बिल्डहोम प्राइवेट लिमिटेड

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धारा 53ए सीआरपीसी- सिर्फ डीएनए प्रोफाइलिंग में चूक या खामी को ही बलात्कार के साथ हत्या के मामलों में घातक नहीं माना जा सकता : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल डीएनए प्रोफाइलिंग में चूक या खामी को ही बलात्कार के साथ हत्या के मामलों में घातक नहीं माना जा सकता। जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सी टी रविकुमार की पीठ ने कहा, "डीएनए प्रोफाइलिंग करने के लिए चूक या खामी (उद्देश्यपूर्ण या अन्यथा) को बलात्कार के अपराध के ट्रायल के भाग्य का फैसला करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, खासकर जब इसे हत्या के अपराध के गठन के साथ जोड़ा जाता है, क्योंकि बरी होने की स्थिति में केवल इस तरह के दोष या जांच में खामी के कारण आपराधिक न्याय का कारण ही पीड़ित बन जाएगा।"

वीरेंद्र बनाम मध्य प्रदेश राज्य | 2022 लाइव लॉ (SC) 480 | 2018 की सीआरए 5 और 6 | 13 मई 2022

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तब्लीगी जमात : सुप्रीम कोर्ट ने ब्लैकलिस्ट किए गए लोगों के भविष्य में वीज़ा आवेदनों पर ब्लैकलिस्टिंग आदेश से प्रभावित हुए बिना विचार करने के निर्देश दिए

तब्लीगी जमात मण्डली के संबंध में लगभग 3500 व्यक्तियों को ब्लैकलिस्ट करने के संबंध में ससुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भारत संघ के इस अनुरोध को दर्ज किया कि याचिकाकर्ताओं या इसी तरह के व्यक्तियों को ब्लैकलिस्ट करने का आदेश नहीं दिया गया है, और संबंधित अधिकारियों को भविष्य में याचिकाकर्ताओं या समान रूप से नियुक्त व्यक्तियों द्वारा मामले के आधार पर कानून के अनुसार वीज़ा प्रदान करने के लिए आवेदन का परीक्षण करने का निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मौखिक रूप से टिप्पणी की थी कि याचिकाकर्ता सरकार के सुझाव पर विचार कर सकते हैं कि वे व्यक्तिगत मामलों पर उनकी योग्यता के आधार पर फिर से विचार करें, क्योंकि वहां यदि सभी नहीं तो योग्य मामलों के संबंध में एक प्रस्ताव का दायरा हो सकता है।

केस : मौलाना आला हद्रामी और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य

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सुप्रीम कोर्ट ने जमानत मिलने के तुरंत बाद यूपी पुलिस द्वारा आजम खान के खिलाफ नई प्राथमिकी दर्ज करने पर चिंता जताई

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बुधवार को चिंता व्यक्त की कि जैसे ही समाजवादी पार्टी के विधायक आजम खान को जमानत मिली, उनके खिलाफ एक नया मामला दर्ज कर दिया गया। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू के अनुरोध पर जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस ए.एस. बोपन्ना ने राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया और मामले को मंगलवार (17 मई) तक के लिए स्थगित कर दिया।

पिछली सुनवाई ने बेंच ने हाईकोर्ट द्वारा उनकी जमानत अर्जी के निपटारे में हो रही अत्यधिक देरी पर नाराजगी जताई। हालांकि, चूंकि फैसला पहले से ही उच्च न्यायालय द्वारा सुरक्षित रखा गया था, इसलिए बेंच ने इसे जल्द से जल्द तय करने का मौका देने का फैसला किया। इसे देखते हुए मामले को 11 मई तक के लिए स्थगित कर दिया गया।

[केस का शीर्षक: मोहम्मद आजम खान बनाम यूपी राज्य। WP(Crl.)no. 39 of 2022 ]

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सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह कानून पर रोक लगाई; पुनर्विचार तक नए मामले दर्ज नहीं हो सकेंगे

एक ऐतिहासिक घटनाक्रम में, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बुधवार को आदेश दिया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124A के तहत 162 साल पुराने राजद्रोह कानून (Sedition) को तब तक स्थगित रखा जाना चाहिए जब तक कि केंद्र सरकार इस प्रावधान पर पुनर्विचार नहीं करती। एक अंतरिम आदेश में, कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से उक्त प्रावधान के तहत कोई भी प्राथमिकी दर्ज करने से परहेज करने का आग्रह किया, जब तक इस पर पुनर्विचार नहीं हो जाता है।

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न्यूनतम वेतन अधिनियम : धारा 10 के तहत वेतन की न्यूनतम दरें तय करने में केवल आदेश में केवल लिपिक या अंकगणितीय गलतियों को ठीक किया जा सकता है : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि न्यूनतम वेतन अधिनियम की धारा 10 को लागू करके वेतन की न्यूनतम दरों को तय करने या संशोधित करने के किसी भी आदेश में केवल लिपिक या अंकगणितीय गलतियों ( Arithmetical Mistakes) को ठीक किया जा सकता है।

जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बी वी नागरत्ना की पीठ ने गोवा राज्य द्वारा जारी की गई 23/24.05.2016 की इरेटा अधिसूचना को संशोधित करते हुए दिनांक 14.07.2016 की अधिसूचना को रद्द कर दिया जिसके द्वारा इसने विभिन्न क्षेत्रों में न्यूनतम वेतन की दरें तय कीं थी।

गोमांतक मजदूर संघ बनाम गोवा राज्य | 2022 लाइव लॉ (SC) 466 | 2022 की सीए 2982 | 10 मई 2022

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आईपीसी की धारा 420- धोखाधड़ी का मामला खारिज किया जा सकता है, अगर आरोपी के खिलाफ बेईमानी का आरोप नहीं लगाया जाता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 के तहत अपराध के लिए व्यक्ति के खिलाफ मामला बनाने के लिए किसी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति को कोई संपत्ति देने के लिए धोखा और बेईमान का प्रलोभन होना चाहिए। इस मामले में शिकायतकर्ता ने कमलेश मूलचंद जैन (रेखा जैन के पति) के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है।

इसमें आरोप लगाया गया है कि उक्त कमलेश मूलचंद जैन ने अन्य बातों के साथ-साथ गलत बयानी, प्रलोभन और धोखा देने के इरादे से दो किलो और 27 ग्राम सोने के आभूषण ले लिए। इसके बाद भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 के तहत अपराध के लिए एफआईआर दर्ज की गई।

रेखा जैन बनाम कर्नाटक राज्य | 2022 लाइव लॉ (एससी) 468 | 2022 का सीआरए 749 | 10 मई 2022

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इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पेश करने के लिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी(4) के तहत प्रमाण-पत्र अनिवार्य; मौखिक साक्ष्य संभवतः पर्याप्त नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 बी (4) के तहत प्रमाण-पत्र अनिवार्य है और ऐसे प्रमाण-पत्र के स्थान पर मौखिक साक्ष्य संभवतः पर्याप्त नहीं हो सकता है। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने अपहरण-सह-हत्या मामले में तीन आरोपियों को दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने दो आरोपियों की अपील स्वीकार करते हुए उन्हें बरी कर दिया। एक आरोपी की सजा को बरकरार रखा गया था, हालांकि मौत की सजा को रद्द कर दिया गया था। इस आरोपी ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

रवींदर सिंह @ काकू बनाम पंजाब सरकार | 2022 लाइव लॉ (एससी) 461 | सीआरए 1307/2019 | 4 मई 2022

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किसी दस्तावेज़ का निष्पादन केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जाता क्योंकि किसी व्यक्ति ने इस पर हस्ताक्षर करना स्वीकार कर लिया है : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी दस्तावेज़ /डीड का निष्पादन केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जाता क्योंकि किसी व्यक्ति ने दस्तावेज़ / डीड पर हस्ताक्षर करना स्वीकार कर लिया है।

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने कहा, धारा 35 (1) (ए) पंजीकरण अधिनियम में " शर्त" निष्पादन का अर्थ है कि एक व्यक्ति ने इसे पूरी तरह से समझने और इसकी शर्तों से सहमत होने के बाद एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए हैं।

वीणा सिंह (डी) बनाम जिला रजिस्ट्रार / अपर कलेक्टर (एफ / आर) | 2022 लाइव लॉ (SC) 462 | 2022 की सीए 2929 | 10 मई 2022

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उन बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए एनसीपीसीआर के सुझावों को लागू करें, जिन्हें COVID-19 के कारण स्कूल छोड़ना पड़ा: सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को राज्य सरकारों से कहा कि वे 'महामारी और अन्य अकल्पनीय स्‍थ‌ितियों के कारण बच्चों की शिक्षा में अनिरंतरता की गंभीर समस्या' के संबंध में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की ओर से द‌िए गए सुझावों और उसके आदेश को प्रचार‌ित करें।

जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई ने आशंका व्यक्त की कि अखबार मौजूदा मामले में सूचना प्रसारित करने का सबसे प्रभावी माध्यम नहीं हो सकते और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे शिक्षा विभाग या महिला एवं बाल कल्याण विभाग से नोडल अधिकारी नियुक्त करें। ये अधिकारी आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, आशा कार्यकर्ताओं, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं आदि को निर्देश देंगे कि वे उन माता-पिता को व्यक्तिगत रूप से संपर्क करें, जिनके बच्चों की महामारी के कारण शिक्षा रुक गई है और उन्हें एनसीपीसीआर की सिफारिशों की जानकारी दें।

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एनआई अधिनियम की धारा 138 – एक व्यक्ति को चेक के अनादर के अपराध के लिए केवल इसलिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि वह उस फर्म का भागीदार था या गांरटर था: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को कहा कि किसी व्यक्ति को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत चेक के अनादर के अपराध के लिए केवल इसलिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि वह उस फर्म का भागीदार था जिसने लोन लिया था या वह इस तरह के लोन के लिए गारंटर के रूप में खड़ा था।

कोर्ट ने इस मामले में दिलीप हरिरामनी बनाम बैंक ऑफ बड़ौदा में कहा कि एनआई अधिनियम की धारा 141 के तहत किसी व्यक्ति पर केवल इसलिए नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि साझेदारी अधिनियम के तहत नागरिक दायित्व भागीदार पर पड़ता है।

केस टाइटल: दिलीप हरिरामनी बनाम बैंक ऑफ बड़ौदा

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