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राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग द्वारा पारित किसी आदेश को हाईकोर्ट के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत रिट याचिका में चुनौती दी जा सकती है : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
14 May 2022 6:23 AM GMT
राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग द्वारा पारित किसी आदेश को हाईकोर्ट के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत रिट याचिका में चुनौती दी जा सकती है : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 58 (1) (ए) (iii) के तहत अपील में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (National Consumer Disputes Redressal Commission) (NCDRC) द्वारा पारित किसी आदेश को हाईकोर्ट के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर एक रिट याचिका में चुनौती दी जा सकती है।

जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि एनसीआरडीसी अनुच्छेद 227 के तहत आने वाला एक "ट्रिब्यूनल" है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रश्न में

दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेश की वैधता का था जिसके द्वारा एनसीडीआरसी के आदेश के खिलाफ दायर अनुच्छेद 227 याचिका को सुनवाई योग्य माना गया। ( इबरत फैजान बनाम ओमेक्स बिल्डहोम प्राइवेट लिमिटेड)

पीठ ने इस मुद्दे के बारे में कहा,

"क्या, राष्ट्रीय आयोग द्वारा 2019 अधिनियम की धारा 58 (1) (ए) (iii) के तहत अपील में पारित आदेश के खिलाफ, भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत संबंधित हाईकोर्ट के समक्ष एक रिट याचिका सुनवाई योग्य होगी ?"

2019 अधिनियम की धारा 67 के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में अपील का उपाय केवल एनसीडीआरसी द्वारा पारित आदेशों के संबंध में उपलब्ध है, जो कि धारा 58 की उप-धारा (1) खंड (ए) के उप-खंड (i) या (ii) द्वारा प्रदत्त अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हैं। दूसरे शब्दों में, सुप्रीम कोर्ट में अपील उपचार केवल एनसीडीआरसी द्वारा पारित मूल आदेशों के संबंध में है। एनसीडीआरसी द्वारा पारित अपीलीय आदेशों के संबंध में कोई और अपील उपाय नहीं दिया गया है।

पीठ ने इस संबंध में कहा,

"राष्ट्रीय आयोग द्वारा 2019 अधिनियम की धारा 58 (1) (ए) (iii) या धारा 58 (1) (ए) (iv) के तहत प्रदत्त अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए पारित आदेश के खिलाफ इस न्यायालय में कोई और अपील प्रदान नहीं की गई है।। मामले की उस दृष्टि में, धारा 58(1)(ए )(iii) या धारा 58(1) (ए) (iv) के अंतर्गत अपील में राष्ट्रीय आयोग द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध पीड़ित पक्ष को जो उपाय उपलब्ध है वो भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अधिकार क्षेत्र वाले संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा।"

एसोसिएटेड सीमेंट कंपनी लिमिटेड बनाम पी एन शर्मा, AIR 1965 SC 1595 में मिसाल पर भरोसा करते हुए, पीठ ने कहा कि "राष्ट्रीय आयोग को एक 'ट्रिब्यूनल' कहा जा सकता है, जो क़ानून द्वारा निहित किसी भी मामले के संबंध में दो या दो से अधिक दावेदार पक्षों के अधिकारों को निर्णायक रूप से निर्धारित करने के लिए निहित है। "

पीठ ने इसके बाद एल चंद्रकुमार में संविधान पीठ के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि ट्रिब्यूनल के आदेशों से पीड़ित पक्ष अनुच्छेद 227 के तहत संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। पीठ ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का उपाय सभी के लिए वहन करने योग्य नहीं हो सकता है।

".. जहां तक भारत के संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत उपलब्ध उपचार का संबंध है, यह विवादित नहीं हो सकता है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत विशेष अनुमति द्वारा अपील के माध्यम से उपचार बहुत महंगा हो सकता है और जैसा कि एल चंद्र कुमार (सुप्रा) के मामले में इस न्यायालय द्वारा कहा और आयोजित किया गया था, उक्त उपाय को वास्तविक और प्रभावी होने के लिए दुर्गम कहा जा सकता है। इसलिए, जब भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत संबंधित हाईकोर्ट में उपाय प्रदान करने से पहले, उस मामले में, यह पीड़ित पक्ष के न्याय तक पहुंच के अधिकार को आगे बढ़ाने के लिए होगा, जो एक शिकायतकर्ता हो सकता है, विशेष अनुमति की बजाय संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अपील करने के लिए कम कीमत पर संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। "

उपरोक्त के मद्देनज़र, न्यायालय ने माना कि हाईकोर्ट ने रिट याचिका पर विचार करने में गलती नहीं की थी। साथ ही, भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत एक रिट याचिका में अंतरिम रोक/राहत देने पर विचार करते हुए, हाईकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत निरीक्षण के सीमित क्षेत्राधिकार को ध्यान में रखना होगा।

जस्टिस शाह द्वारा लिखित निर्णय में कहा गया है,

"उपरोक्त चर्चा को ध्यान में रखते हुए और ऊपर बताए गए कारणों और यहां दी गई टिप्पणियों के अधीन, यह नहीं कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय आयोग द्वारा पारित आदेश के खिलाफ संबंधित हाईकोर्ट के समक्ष भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत एक रिट याचिका 2019 अधिनियम की धारा 58 (1) (ए) (iii) के तहत एक अपील में सुनवाई योग्य नहीं है। हम हाईकोर्ट द्वारा लिए गए विचार से पूरी तरह सहमत हैं।"

केस: इबरत फैजान बनाम ओमेक्स बिल्डहोम प्राइवेट लिमिटेड

साइटेशन: 2022 लाइव लॉ (SC) 481

वकील: अपीलकर्चा की ओर से एडवोकेट सुदीप्त कुमार पाल प्रतिवादी की ओर से एडवोकेट करनजोत सिंह मैनी।

हेड नोट्स: भारत का संविधान - राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण मंच द्वारा पारित अनुच्छेद 227-अपील आदेश को अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है- यह नहीं कहा जा सकता है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत संबंधित हाईकोर्ट के समक्ष एक रिट याचिका उपभोक्ता संरक्षण 2019 अधिनियम की धारा 58 (1) (ए) (iii) के तहत राष्ट्रीय आयोग द्वारा पारित आदेश पर एक अपील सुनवाई योग्य नहीं है (पैरा 16)

भारत का संविधान-अनुच्छेद 227- जब भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत संबंधित हाईकोर्ट में उपाय प्रदान करने से पहले, उस मामले में, यह पीड़ित पक्ष के न्याय तक पहुंच के अधिकार को आगे बढ़ाने के लिए होगा, जो एक शिकायतकर्ता हो सकता है, विशेष अनुमति की बजाय संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अपील करने के लिए कम कीमत पर संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। (पैरा 13)

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 - राष्ट्रीय आयोग को संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत आने वाला 'ट्रिब्यूनल' कहा जा सकता है। (पैरा 12)

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