पीड़िता का शोर न मचाना सहमति का संकेत नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने POCSO के तहत सज़ा रखी बरकरार

Update: 2026-04-23 14:12 GMT

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि किसी नाबालिग पीड़िता का आचरण, जैसे कि शोर न मचाना या भागने की कोशिश न करना, उसे सहमति या अपनी मर्ज़ी का संकेत नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने आगे दोहराया कि एक बार जब पीड़िता का नाबालिग होना साबित हो जाता है तो POCSO Act के तहत सहमति कानूनी रूप से बेमानी हो जाती है। साथ ही पीड़िता की गवाही में छोटी-मोटी विसंगतियां अभियोजन पक्ष के अन्यथा विश्वसनीय मामले को कमज़ोर नहीं करतीं।

इसी आधार पर कोर्ट ने POCSO Act और IPC के तहत अपराधों के लिए अपीलकर्ता की सज़ा बरकरार रखी।

जस्टिस आशीष नैथानी ने आपराधिक अपील खारिज की, जिसमें अपीलकर्ता ने POCSO Act की धारा 6 के तहत 'गंभीर भेदक यौन हमला' (Aggravated Penetrative Sexual Assault) और IPC की धारा 363 और 367 के तहत अपराधों के लिए अपनी सज़ा को चुनौती दी थी।

यह मामला उन आरोपों से जुड़ा था कि अपीलकर्ता ने नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर उसके माता-पिता की कानूनी देखरेख से दूर ले जाकर अपने साथ रखा, और इस दौरान उसने उसके साथ गंभीर भेदक यौन हमला किया।

जांच के बाद एक चार्जशीट दायर की गई। इस जांच में CrPC की धारा 164 के तहत पीड़िता का बयान दर्ज करना और मेडिकल जांच शामिल थी। ट्रायल कोर्ट ने मौखिक और दस्तावेज़ी सबूतों का मूल्यांकन करने के बाद अपीलकर्ता को दोषी ठहराया और उसे POCSO Act के तहत 10 साल की कठोर कारावास की सज़ा सुनाई। साथ ही IPC के प्रावधानों के तहत अतिरिक्त सज़ाएं भी दीं।

अपीलकर्ता ने मुख्य रूप से इस आधार पर सज़ा को चुनौती दी कि अभियोजन पक्ष कानून के अनुसार पीड़िता के नाबालिग होने को साबित करने में विफल रहा है> उसका तर्क था कि स्कूल रिकॉर्ड पर भरोसा करना, बिना उनके लेखक या स्रोत की जांच किए, अपर्याप्त है।

आगे यह भी तर्क दिया गया कि पीड़िता की गवाही में महत्वपूर्ण विसंगतियां और मनगढ़ंत बातें हैं। उसके आचरण से यह प्रतीत होता है कि वह अपनी मर्ज़ी से साथ थी। अपीलकर्ता ने यह कहते हुए मेडिकल सबूतों पर भी सवाल उठाया कि वे निर्णायक रूप से यौन हमले को साबित नहीं करते या बल प्रयोग का संकेत नहीं देते।

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि पीड़िता की उम्र दस्तावेज़ी सबूतों, जिसमें स्कूल रिकॉर्ड भी शामिल हैं, उसके माध्यम से विधिवत स्थापित की गई। साथ ही इन सबूतों को प्रभावी ढंग से चुनौती नहीं दी गई।

Case Name: Sagar Ray v State of Uttarakhand

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