तलाक के मामलों का शीघ्र निस्तारण निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार की कीमत पर नहीं हो सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

Update: 2026-07-29 10:46 GMT

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवादों के त्वरित निस्तारण का मतलब यह नहीं है कि किसी पक्ष को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर ही न दिया जाए। इसी टिप्पणी के साथ अदालत ने हरिद्वार फैमिली कोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें पत्नी का लिखित जवाब दाखिल करने का अधिकार समाप्त कर उसके खिलाफ एकपक्षीय कार्यवाही करने का निर्देश दिया गया था।

जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने कहा कि चूंकि पत्नी फैमिली कोर्ट में उपस्थित हुई और उसने लिखित जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि वह कार्यवाही में भाग लेने की इच्छुक नहीं थी। ऐसे में उसका पक्ष बंद करने से पहले उसे उचित अवसर दिया जाना चाहिए था।

मामला हरिद्वार फैमिली कोर्ट में पति द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(क) और 13(1)(ख) के तहत दायर तलाक की याचिका से जुड़ा है। फैमिली कोर्ट ने 1 जुलाई 2026 को पत्नी का लिखित जवाब दाखिल करने का अधिकार समाप्त कर दिया था और मामले में एकपक्षीय सुनवाई का आदेश दिया था।

पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर कहा कि वह निर्धारित तिथि पर फैमिली कोर्ट में मौजूद थी और उसने लिखित जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा था। उसका कहना था कि अदालत द्वारा दिए गए वाद व्यय की राशि पति ने अदा नहीं की थी, जिसके कारण वह प्रभावी ढंग से अपना बचाव नहीं कर सकी। इसलिए उसका बचाव का अधिकार समाप्त करना उचित नहीं था।

वहीं, पति की ओर से कहा गया कि 5,000 रुपये वाद व्यय और 200 रुपये यात्रा व्यय 1 जुलाई 2026 को ही पत्नी को देने की पेशकश कर दी गई थी। इसलिए यह कहना गलत है कि भुगतान न होने के कारण वह जवाब दाखिल नहीं कर सकी।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही 1 जुलाई को वाद व्यय का भुगतान कर दिया गया हो, फिर भी उसके बाद पत्नी को लिखित जवाब दाखिल करने के लिए उचित समय दिया जाना चाहिए था।

अदालत ने कहा,

"वैवाहिक मामलों के शीघ्र निस्तारण का निर्देश इस रूप में नहीं लिया जा सकता कि किसी भी पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर ही न दिया जाए। ऐसी स्थिति में पत्नी का बचाव का अधिकार समाप्त कर उसके खिलाफ एकपक्षीय कार्यवाही करना उचित नहीं था।"

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया और पत्नी को लिखित जवाब दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय देने का निर्देश दिया। साथ ही फैमिली कोर्ट से कहा कि इसके बाद मामले का शीघ्र निस्तारण किया जाए और अनावश्यक स्थगन न दिए जाएं।

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