यह गुंडागर्दी है, आपको किस कानून ने अधिकार दिया? : संसद मार्च से पहले नेता को रोकने पर उत्तराखंड हाईकोर्ट की पुलिस को फटकार
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मंगलवार को संसद मार्च में शामिल होने जा रहे उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी (UPP) के अध्यक्ष प्रभात ध्यानी को रास्ते में हिरासत में लेने पर राज्य पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी नाराज़गी जताई।
कोर्ट ने पुलिस से पूछा कि आखिर किस कानून के तहत उन्हें दिल्ली जाने से रोका गया।
जस्टिस रवींद्र मैठाणी और जस्टिस सिद्धार्थ साह की खंडपीठ के समक्ष राज्य सरकार ने दलील दी कि ध्यानी की हिरासत पूरी तरह वैध थी।
इस पर कोर्ट ने पूछा,
"किस कानून के तहत? BNSS की किस धारा के तहत?"
राज्य की ओर से BNSS की धारा 163 का हवाला दिया गया, जिस पर कोर्ट ने सवाल किया कि क्या देहरादून के जिला मजिस्ट्रेट ने इसके तहत कोई आदेश पारित किया था।
सरकार के वकील ने कहा कि ध्यानी ने स्वयं सोशल मीडिया पर संसद मार्च में शामिल होने की घोषणा की थी। उन्होंने बताया कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से सरकार को कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन संसद मार्च की अनुमति नहीं दी गई।
इस पर हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा,
"आप कौन हैं? आप दिल्ली पुलिस तो नहीं हैं।"
राज्य ने दलील दी कि यदि कहीं भी संज्ञेय अपराध होने की आशंका हो तो पुलिस कार्रवाई कर सकती है।
इस पर कोर्ट ने कहा,
"यह तो बड़ा अजीब कानून बता रहे हैं। यहां संज्ञेय अपराध क्या था? धारा 163 लागू भी नहीं थी। धारा 172 के तहत आपने कौन-सा वैध निर्देश जारी किया था?"
राज्य ने कहा कि ध्यानी संसद मार्च में शामिल होने के लिए ऋषिकेश से दिल्ली जा रहे थे और यदि धारा 163 के आदेश का उल्लंघन होता तो वह BNSS की धारा 223 के तहत संज्ञेय अपराध बनता।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा,
"उसे पूरे देश में कहीं भी आने-जाने का अधिकार है। उसे रोकने वाले आप कौन होते हैं? यदि धारा 144 का उल्लंघन होगा तो वह दिल्ली में होगा। उत्तराखंड पुलिस का वहां क्या अधिकार क्षेत्र है?"
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा,
"यह गुंडागर्दी है। आपके पास कौन-सा वैध अधिकार था? 'दिल्ली मत जाओ, मार्च में मत शामिल हो' ऐसा कहने वाले आप कौन होते हैं? दिल्ली पुलिस अपना काम करेगी।"
कोर्ट ने सरकारी दस्तावेज़ का उल्लेख करते हुए कहा,
"आपने लिखा है कि सरकार की छवि प्रभावित होगी। आप इस देश में क्या कर रहे हैं? सरकार की छवि बचाने के लिए हैं या नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए? पुलिस का यह रवैया पूरी तरह अस्वीकार्य है।"
जब राज्य ने राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क दिया तो हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा,
"यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकार की छवि के नाम पर लोगों को परेशान मत कीजिए।"
कोर्ट ने मामले में राज्य सरकार और पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
सुनवाई के अंत में हाईकोर्ट ने कहा,
"अगर पुलिस की यह दलील मान ली जाए तो कल कोई व्यक्ति हल्द्वानी जा रहा होगा और रास्ते में कहीं प्रदर्शन होगा तो पुलिस कहेगी कि वहां मत जाओ। यह अराजकता होगी। हम संविधान के तहत चलने वाले देश में रहते हैं, जहां अनुच्छेद 19 और 21 नागरिकों को अधिकार देते हैं।"
यह मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें आरोप लगाया गया कि प्रभात ध्यानी को बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए पहले रेलवे पुलिस और फिर उत्तराखंड पुलिस ने हिरासत में लिया था।
याचिका में उनकी हिरासत को अवैध बताते हुए उससे जुड़े सभी दस्तावेज़, गिरफ्तारी का आधार और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने के निर्देश देने की भी मांग की गई।