गवाह को धमकी मिलना मात्र मुकदमे के स्थानांतरण का आधार नहीं, गवाह संरक्षण कानून का किया जाए उपयोग : उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि केवल गवाहों को धमकी मिलने के आरोप के आधार पर किसी आपराधिक मुकदमे को एक अदालत से दूसरी अदालत में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। यदि गवाहों की सुरक्षा के लिए कानून में व्यवस्था उपलब्ध है तो पहले उसी का सहारा लिया जाना चाहिए।
जस्टिस सिद्धार्थ साह ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 407 के तहत दायर एक स्थानांतरण याचिका पर यह फैसला सुनाया।
मामला हत्या और शस्त्र अधिनियम के तहत दर्ज एक आपराधिक मुकदमे से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने अनुरोध किया था कि देहरादून की जिला एवं सत्र अदालत में लंबित मुकदमे को हरिद्वार की सक्षम अदालत में स्थानांतरित किया जाए।
याचिकाकर्ता का कहना था कि आरोपी और उसके परिवार का आपराधिक इतिहास है तथा वे लगातार उसे और उसके परिवार को मुकदमा आगे बढ़ाने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे हैं। यह भी आरोप लगाया गया कि 10 फरवरी, 2023 को अदालत परिसर में प्रत्यक्षदर्शी गवाह को भी धमकाया गया> इस संबंध में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और स्थानीय पुलिस को सूचना देने के बावजूद कोई प्रभावी सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई गई।
हाईकोर्ट के निर्देश पर विचारण अदालत से रिपोर्ट मंगाई गई। रिपोर्ट में बताया गया कि याचिकाकर्ता का बयान 9 जनवरी 2023 को अभियोजन के पहले गवाह के रूप में दर्ज किया जा चुका है। इसके अलावा अभियोजन के दो अन्य गवाहों की भी गवाही हो चुकी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सुनवाई के दौरान न तो याचिकाकर्ता और न ही किसी अन्य गवाह ने अदालत को किसी धमकी की जानकारी दी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तराखंड गवाह संरक्षण अधिनियम 2020 में गवाहों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था मौजूद है ताकि वे बिना किसी भय के अदालत में गवाही दे सकें।
अदालत ने कहा कि अधिनियम की धारा 4 और 5 के तहत कोई भी गवाह सक्षम प्राधिकारी के समक्ष सुरक्षा के लिए आवेदन कर सकता है। इसके बाद संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या पुलिस अधीक्षक से खतरे का आकलन कराने वाली रिपोर्ट प्राप्त की जाती है। यदि तत्काल खतरे की स्थिति हो तो अंतिम निर्णय से पहले अंतरिम सुरक्षा भी प्रदान की जा सकती है।
पीठ ने कहा,
"जब अधिनियम की धारा 4 और 5 के तहत गवाहों को सुरक्षा देने की व्यवस्था पहले से मौजूद है और याचिकाकर्ता का बयान भी 9 जनवरी, 2023 को अभियोजन के पहले गवाह के रूप में दर्ज किया जा चुका है, तो इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं बनता।"
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि मुकदमे के स्थानांतरण का कोई आधार नहीं बनता और याचिका खारिज की।