NBFC द्वारा रिकवरी एजेंटों से जबरन वाहन कब्ज़े में लेना असंवैधानिक: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दिया लौटाने का आदेश
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFC) यदि रिकवरी एजेंटों के माध्यम से बिना विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाए वित्तपोषित वाहनों का जबरन कब्ज़ा लेती हैं, तो यह अवैध होने के साथ-साथ संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन भी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी कार्रवाई कानून के शासन के विपरीत है और इससे नागरिकों के आजीविका के अधिकार का हनन होता है।
जस्टिस पंकज पुरोहित ने समान प्रकृति की दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। दोनों मामलों में परिवहन व्यवसाय से जुड़े याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उनकी गाड़ियों को सार्वजनिक मार्गों पर रोककर रिकवरी एजेंटों ने जबरन अपने कब्ज़े में ले लिया जबकि बकाया राशि को लेकर विवाद लंबित था।
एक मामले में याचिकाकर्ता ने बताया कि 31 लाख रुपये से अधिक के वित्तपोषण पर खरीदा गया वाहन व्यावसायिक माल लेकर जा रहा था, तभी रिकवरी एजेंटों ने चालक को हटाकर वाहन कब्ज़े में ले लिया।
दूसरे मामले में याचिकाकर्ता का कहना था कि मूल ऋण राशि से अधिक भुगतान किए जाने के बावजूद विवादित बकाया के नाम पर वाहन कब्ज़े में लेने की कोशिश की गई।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि NBFC की कार्रवाई भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी रिकवरी संबंधी दिशा-निर्देशों के विपरीत है।
उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि ऋण वसूली के लिए बलपूर्वक या दबावपूर्ण तरीके अपनाना स्वीकार्य नहीं है।
वहीं वित्तीय कंपनी की ओर से कहा गया कि विवाद संविदात्मक प्रकृति का है। इसलिए रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। कंपनी ने यह भी दावा किया कि ऋण अदायगी में चूक होने पर समझौते के तहत उसे वाहन वापस लेने का अधिकार है।
हाईकोर्ट ने इस दलील को सीमित रूप से स्वीकार करते हुए कहा कि सामान्यतः संविदात्मक विवाद रिट क्षेत्राधिकार में नहीं आते, लेकिन जब कार्रवाई मनमानी हो, वैधानिक या नियामकीय प्रावधानों का उल्लंघन करती हो अथवा मौलिक अधिकारों का हनन करती हो तब मामला निजी विवाद न रहकर सार्वजनिक विधि का विषय बन जाता है।
मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला दिया और कहा कि रिकवरी एजेंटों या बाहुबल के माध्यम से वाहन कब्ज़े में लेना विधि विरुद्ध है।
अदालत ने कहा कि केवल ऋण अनुबंध में पुनः कब्ज़े का प्रावधान होने से कंपनी को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं मिल जाता।
हाईकोर्ट ने कहा,
"संविदात्मक शर्तें संवैधानिक गारंटी या वैधानिक संरक्षणों पर वरीयता नहीं पा सकतीं। संविदात्मक अधिकारों का प्रवर्तन भी वैधता और विधिसम्मत प्रक्रिया के अधीन होगा।"
अदालत ने पाया कि कंपनी यह सिद्ध नहीं कर सकी कि उसने वाहन कब्ज़े में लेने से पहले नोटिस जारी किया या किसी वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया। ऐसे में उसकी कार्रवाई टिकाऊ नहीं मानी जा सकती।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि संबंधित वाहन याचिकाकर्ताओं की आजीविका का प्रमुख साधन हैं। इसलिए बिना विधिक प्रक्रिया के उनसे वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(ग) और 21 का उल्लंघन है।
अदालत ने दोनों याचिकाएं स्वीकार करते हुए वाहनों का कब्ज़ा याचिकाकर्ताओं को लौटाने का निर्देश दिया तथा NBFC को भविष्य में विधिसम्मत प्रक्रिया के बिना किसी प्रकार की हस्तक्षेपात्मक कार्रवाई से रोका। साथ ही स्पष्ट किया कि बकाया वसूली केवल कानून द्वारा स्वीकृत प्रक्रिया के माध्यम से ही की जा सकती है।