परिवार पेंशनभोगी को 'आश्रित' बताकर मेडिकल प्रतिपूर्ति से वंचित नहीं किया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

Update: 2026-04-20 08:21 GMT

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि परिवार पेंशन पाने वाले व्यक्ति को आश्रित मानकर मेडिकल प्रतिपूर्ति (मेडिकल रिइम्बर्समेंट) से वंचित नहीं किया जा सकता, खासकर जब वह अपने स्वतंत्र अधिकार के रूप में इस लाभ का दावा कर रहा हो। कोर्ट ने कहा कि यदि राज्य सरकार ने किसी परिवार पेंशनभोगी को स्वास्थ्य योजना का लाभ दिया और उससे नियमित अंशदान भी लिया जा रहा है, तो बाद में आयु सीमा का हवाला देकर दावा खारिज करना अनुचित है।

जस्टिस पंकज पुरोहित ने एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता एक दिवंगत सरकारी कर्मचारी की पुत्री हैं। उसको वर्ष 2020 में अपनी माता के निधन के बाद परिवार पेंशन मिलनी शुरू हुई। उन्हें राज्य सरकार की स्वास्थ्य योजना के तहत गोल्डन कार्ड भी जारी किया गया और उनकी पेंशन से नियमित कटौती की जा रही थी।

वर्ष 2021 में एक दुर्घटना के बाद उनका इलाज दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में हुआ। उनके कुछ छोटे खर्चों की प्रतिपूर्ति कर दी गई लेकिन लगभग 4.29 लाख रुपये का बड़ा दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि इलाज के समय उनकी आयु 25 वर्ष से अधिक थी, इसलिए वे पात्र नहीं हैं।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संबंधित सरकारी आदेश आश्रितों पर लागू होते हैं, जबकि वह परिवार पेंशनभोगी होने के नाते अपने स्वतंत्र अधिकार से दावा कर रही हैं। साथ ही उन्हें गोल्डन कार्ड दिया गया और उनसे अंशदान भी लिया गया, जिससे उनकी पात्रता स्वतः सिद्ध होती है।

वहीं, राज्य पक्ष ने कहा कि 25 वर्ष से अधिक आयु के आश्रितों को इस योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता और इसी आधार पर दावा खारिज किया गया।

कोर्ट ने इस विवाद को सीमित दायरे का बताते हुए कहा कि मूल प्रश्न यह है कि क्या परिवार पेंशनभोगी को आश्रित मानकर लाभ से वंचित किया जा सकता है। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि प्रतिवादियों द्वारा अपनाया गया आधार विधिसंगत नहीं है, क्योंकि याचिकाकर्ता एक स्वतंत्र लाभार्थी हैं न कि आश्रित।

कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता को गोल्डन कार्ड जारी किया गया और उनसे नियमित अंशदान लिया जा रहा था। ऐसे में उनका दावा खारिज करना मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

साथ ही कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पहले उनके कुछ खर्चों की प्रतिपूर्ति की जा चुकी थी, जिससे उनकी पात्रता पहले ही स्वीकार की जा चुकी थी। उपचार, प्रमाणपत्र या खर्च की वास्तविकता पर भी कोई विवाद नहीं था।

इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने दावा खारिज करने वाला आदेश रद्द किया और राज्य को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को पूरी राशि 5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अदा की जाए।

इस तरह कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि सरकारी योजनाओं में शामिल लाभार्थियों के साथ मनमानी नहीं की जा सकती और उनके अधिकारों का संरक्षण किया जाना आवश्यक है।

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