बिना जांच बर्खास्तगी पर उत्तराखंड हाईकोर्ट सख्त, कहा- बड़ी सजा देने से पहले विभागीय जांच जरूरी

Update: 2026-04-24 10:45 GMT

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि किसी कर्मचारी पर बड़ी सजा थोपने के लिए विभागीय जांच को सामान्य रूप से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच से छूट देने की शक्ति केवल असाधारण परिस्थितियों में और ठोस कारणों के आधार पर ही प्रयोग की जा सकती है।

जस्टिस मनोज कुमार तिवारी पुलिस कांस्टेबल की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसे वर्ष 2020 में कथित दुर्व्यवहार के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। आरोप है कि लॉकडाउन के दौरान क्वारंटीन केंद्र में उसने एक महिला के साथ अभद्र व्यवहार किया और नशे की हालत में पाया गया।

याचिकाकर्ता का कहना था कि घटना के उसी दिन बिना किसी विभागीय जांच और बिना सुनवाई का अवसर दिए उसे बर्खास्त कर दिया गया, जो नियमों और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। राज्य ने अपने पक्ष में उसी दिन तैयार की गई रिपोर्ट का हवाला दिया।

अदालत ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि बर्खास्तगी से पहले कोई विभागीय जांच नहीं की गई।

कोर्ट ने कहा,

“विभागीय जांच से छूट देने की शक्ति केवल उन विशेष परिस्थितियों में प्रयोग की जानी चाहिए, जब जांच करना व्यावहारिक रूप से संभव न हो।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस शक्ति का उपयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। इसके लिए ठोस कारण होना जरूरी है, जैसे गवाहों को खतरा, अनुशासन की गंभीर स्थिति या ऐसी परिस्थितियां जहां जांच संभव न हो।

हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित अधिकारी ने बिना विचार किए यांत्रिक तरीके से उसी दिन बर्खास्तगी का आदेश पारित किया।

अदालत ने कहा,

“केवल किसी शक्ति का होना उसके उपयोग को उचित नहीं ठहराता खासकर, जब उससे किसी नागरिक के अधिकार प्रभावित होते हों।”

इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी आदेश को कानून के विपरीत बताते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने कांस्टेबल की सेवा बहाल करने सेवा की निरंतरता बनाए रखने और 50 प्रतिशत बकाया वेतन देने का निर्देश दिया।

साथ ही अदालत ने विभाग को यह स्वतंत्रता दी कि वह तीन महीने के भीतर कानून के अनुसार नई विभागीय कार्यवाही शुरू कर सकता है।

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