एक ही तथ्यों पर 'आपराधिक न्यास भंग' और 'धोखाधड़ी' साथ-साथ लागू नहीं हो सकते: ओडिशा हाईकोर्ट

Update: 2026-01-02 14:58 GMT

ओडिशा हाईकोर्ट ने दोहराया है कि एक ही तथ्यों के आधार पर एक ही मामले में 'आपराधिक न्यास भंग' (Criminal Breach of Trust) और 'धोखाधड़ी' (Cheating) दोनों अपराधों को एक साथ लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी के अपराध में झूठे या भ्रामक प्रतिनिधित्व के समय से ही आपराधिक मंशा मौजूद होना आवश्यक है, जबकि आपराधिक न्यास भंग के मामले में प्रारंभिक मंशा आपराधिक नहीं होती — वहाँ पहले वैध रूप से संपत्ति सौंपी जाती है और बाद में उसका दुरुपयोग किया जाता है।

जस्टिस राधा कृष्ण पटनायक की पीठ ने JMFC द्वारा दोनों अपराधों के लिए एक साथ संज्ञान लेने के आदेश को निरस्त करते हुए कहा:

“अभिलेख का अवलोकन करने पर प्रतीत होता है कि अधीनस्थ न्यायालय ने उपलब्ध सामग्री और चार्जशीट का समुचित परीक्षण नहीं किया तथा यह निष्कर्ष नहीं निकाला कि दोनों में से कौन-सा अपराध prima facie बनता है। दिनांक 29 अगस्त 2025 का आदेश संक्षिप्त एवं अस्पष्ट है।”

मामले में अभियुक्त के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316(5) (आपराधिक न्यास भंग) और धारा 318(4) (धोखाधड़ी) के तहत 70 लाख रुपये के गबन के आरोप में FIR दर्ज की गई थी। चार्जशीट दाखिल होने पर JMFC, दिगपहांडी ने दोनों अपराधों के लिए एक साथ संज्ञान लिया। अभियुक्त ने इस आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि दोनों अपराध एक साथ लागू नहीं हो सकते।

याचिकाकर्ता के वकील शैलजा नंदन दास ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसलों —

Delhi Race Club (1940) Ltd. बनाम State of Uttar Pradesh (2024) तथा

Arshad Neyaz Khan बनाम State of Jharkhand (2025) — पर भरोसा किया, जिनमें स्पष्ट किया गया है कि दोनों अपराध परस्पर विरोधी (antithetical) हैं और एक साथ लागू नहीं हो सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि—

धोखाधड़ी में प्रारंभ से ही आपराधिक मंशा आवश्यक होती है,

जबकि न्यास भंग में संपत्ति पहले वैध रूप से सौंपी जाती है और बाद में उसका दुरुपयोग किया जाता है।

ऐसी स्थिति में दोनों अपराध एक साथ नहीं चल सकते।

इन सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने न्यायिक दिमाग का समुचित उपयोग नहीं किया और आदेश “अति संक्षिप्त” है। इसलिए आदेश को निरस्त करते हुए मामले की पुनः समीक्षा करने और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कारणयुक्त (reasoned) आदेश पारित करने का निर्देश दिया गया।

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