BNSS में 60 दिन की अवधि चार्ज फ्रेम करने पर पूर्ण रोक नहीं: उड़ीसा हाईकोर्ट
उड़ीसा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि BNSS की धारा 262(1) के तहत आरोपी को डिस्चार्ज आवेदन दाखिल करने के लिए दी गई 60 दिनों की अवधि कोई कठोर या अनिवार्य “moratorium” नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस पेपर धारा 230 BNSS के तहत उपलब्ध कराने के बाद ट्रायल कोर्ट, आरोपी को उचित अवसर देने के लिए एक reasonable interval के बाद चार्ज फ्रेम कर सकता है। हालांकि, पुलिस पेपर देने और उसी दिन चार्ज फ्रेम करने की प्रक्रिया से बचना बेहतर होगा।
जस्टिस डॉ. संजीब कुमार पाणिग्रही ने कहा कि धारा 262(1) को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि 60 दिन पूरे होने से पहले किसी भी परिस्थिति में चार्ज फ्रेम ही नहीं किया जा सकता। ऐसा करने से आरोपी को दिया गया सुरक्षा का अधिकार ही मुकदमे में देरी का माध्यम बन जाएगा।
क्या था मामला?
आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने के बाद वे 18 फरवरी 2026 को JMFC (Outskirt), भुवनेश्वर के सामने पेश हुए। उसी दिन उन्हें धारा 230 BNSS के तहत पुलिस पेपर उपलब्ध कराए गए।
इसके कुछ ही समय बाद, उसी दिन मजिस्ट्रेट ने आरोपियों के खिलाफ BNS की धारा 303(2), 3(5) और संबंधित खनन कानूनों के तहत चार्ज फ्रेम कर दिया।
बाद में आरोपियों ने धारा 262 BNSS के तहत डिस्चार्ज आवेदन दाखिल किया, लेकिन इसे 23 जून 2026 को कारणयुक्त आदेश के जरिए खारिज कर दिया गया।
इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया और उसी दिन पुलिस पेपर देने तथा चार्ज फ्रेम करने की प्रक्रिया को चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने माना कि धारा 262(1) के तहत 60 दिन की अवधि आरोपी को पुलिस रिपोर्ट और दस्तावेजों की जांच कर डिस्चार्ज मांगने का वास्तविक अवसर देने के लिए है।
लेकिन केवल प्रक्रिया में हुई गलती से चार्ज स्वतः रद्द नहीं हो जाएगा। इसके लिए आरोपी को यह दिखाना होगा कि उस गलती से उसे वास्तविक और गंभीर prejudice हुआ तथा निष्पक्ष बचाव का अवसर प्रभावित हुआ।
इस मामले में आरोपियों को डिस्चार्ज आवेदन दाखिल करने का अधिकार मिला था और उनका आवेदन गुण-दोष के आधार पर सुना और खारिज किया गया। इसलिए कोर्ट ने माना कि उन्हें कोई गंभीर prejudice नहीं हुआ।
ट्रायल कोर्ट्स को दी अहम सलाह
हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट्स को धारा 230 के तहत पुलिस पेपर उपलब्ध कराने और चार्ज फ्रेम करने के बीच उचित समय का अंतर रखना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि दोनों प्रक्रियाओं को केवल प्रशासनिक सुविधा के कारण एक ही दिन में पूरा करना उचित नहीं है।
अंततः हाईकोर्ट ने याचिका में कोई मेरिट नहीं पाते हुए उसे खारिज कर दिया।