उड़ीसा हाईकोर्ट ने राज्य में डिप्टी चीफ मिनिस्टर की नियुक्ति की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली PIL (जनहित याचिका) खारिज की। कोर्ट ने कहा कि यह पद "सिर्फ नाम का" है और इस पद पर बैठे व्यक्ति को मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की तुलना में कोई उच्च संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं होती है। [2026 LiveLaw (Ori) 107]

इस पद के औपचारिक उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए चीफ जस्टिस हरीश टंडन और जस्टिस चित्तरंजन डैश की डिवीजन बेंच ने कहा,

“ऊपर बताई गई रिपोर्ट में दिए गए सिद्धांत पर हमारे मन में कोई संदेह नहीं है कि 'डिप्टी चीफ मिनिस्टर' का पद केवल नाम का है और यह मंत्रिपरिषद का ही एक अभिन्न अंग है। राष्ट्रपति सचिवालय और राज्य द्वारा जारी 'वरीयता तालिका' (Table of Precedence) या 'वरीयता वारंट' (Warrant of Precedence) केवल औपचारिक उद्देश्यों तक सीमित है। इसका भारत के संविधान के अनुच्छेद 163 के तहत मंत्रिपरिषद द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले अधिकारों, विशेषाधिकारों और शक्तियों से कोई लेना-देना नहीं है और न ही यह उनमें कोई दखल देता है। इसका मंत्रिपरिषद से ऊपर की शक्तियों का इस्तेमाल करके शासन चलाने से कोई संबंध नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य केवल केंद्र और राज्य द्वारा आयोजित औपचारिक कार्यक्रमों का सुचारू रूप से संचालन सुनिश्चित करना है।”

कोर्ट वकील एलीना डैश द्वारा दायर एक PIL पर सुनवाई कर रहा था। मुख्य चुनौती इस पद की वैधता को लेकर थी, क्योंकि संविधान में इसका कोई प्रावधान नहीं है। पिछले महीने सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील श्रीनिवास मोहंती ने तर्क दिया कि डिप्टी सीएम की नियुक्ति करके, राज्य सरकार ने मंत्रिपरिषद के भीतर एक अतिरिक्त-संवैधानिक "तीन-स्तरीय पदानुक्रम" (Three-Tier Hierarchy) बनाने की कोशिश की है, यानी चीफ मिनिस्टर, डिप्टी सीएम और अन्य मंत्री।

संविधान के अनुच्छेद 163 और 164 का हवाला देते हुए - जो क्रमशः राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद और मंत्रियों से संबंधित प्रावधानों का वर्णन करते हैं - याचिकाकर्ता की ओर से यह कहा गया कि संविधान केवल राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए चीफ मिनिस्टर के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद का प्रावधान करता है। हालांकि, कोई भी प्रावधान डिप्टी सीएम की नियुक्ति करने के लिए किसी भी प्राधिकरण को अधिकृत या सशक्त नहीं करता है।

राज्य की ओर से एडवोकेट जनरल पीतांबर आचार्य ने इन नियुक्तियों का बचाव करते हुए कहा कि डिप्टी सीएम सिर्फ़ मंत्रिपरिषद का हिस्सा होते हैं और इस पद के लिए कोई खास नियम न होने का मतलब यह नहीं है कि ऐसी नियुक्ति असंवैधानिक या गैर-कानूनी है।

इसके बाद एडवोकेट मोहंती ने राष्ट्रपति सचिवालय और राज्य सरकार, दोनों द्वारा जारी 'वारंट ऑफ़ प्रेसिडेंस' (वरीयता क्रम) में डिप्टी सीएम को अतिरिक्त वेतन-भत्ते, विशेषाधिकार, प्रोटोकॉल और ऊंचा दर्जा देने की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए।

के.एम. शर्मा बनाम देवी लाल और अन्य (1990) मामले का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने साफ़ किया कि डिप्टी सीएम का पद मंत्रिपरिषद के सदस्य जैसा ही होता है और सिर्फ़ यह पदनाम होने से डिप्टी सीएम को मुख्यमंत्री की कोई शक्ति नहीं मिल जाती।

कोर्ट ने आगे कहा,

"डिप्टी मुख्यमंत्री के तौर पर ली गई शपथ, जो असल में व्यक्ति की पहचान बताने वाली होती है, संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं करती। पहचान बताने वाले विवरण और शपथ के मुख्य हिस्से के बीच फ़र्क किया जाना चाहिए; अगर मुख्य हिस्से का सख्ती से पालन किया जाता है, तो सिर्फ़ विवरण की वजह से संवैधानिक नियमों के तहत ली गई शपथ अमान्य नहीं हो जाती।"

कोर्ट ने याचिकाकर्ता की उस मांग को खारिज किया, जिसमें सरकार की मंशा पर शक किया गया। यह मामला 'ओडिशा विधानसभा सदस्य वेतन, भत्ते और पेंशन (संशोधन) विधेयक, 2025' से जुड़ा था, जिसे पिछले साल राज्य विधानसभा में विधायकों के वेतन-भत्ते काफी बढ़ाने के मकसद से पेश किया गया। इसे कोर्ट में चुनौती दी गई थी और विधेयक पास होने से पहले ही सरकार ने इसे वापस ले लिया।

डॉ. शेखर एस. अय्यर बनाम मुख्य सचिव और अन्य (2018) मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने साफ़ किया कि डिप्टी सीएम का पद सिर्फ़ एक नाम या पहचान है; असल में वे मंत्री परिषद का ही हिस्सा होते हैं। 'वारंट ऑफ़ प्रेसिडेंस' (वरीयता क्रम) सिर्फ़ औपचारिक कामों के लिए होता है। इसका डिप्टी सीएम की शक्तियों या अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि इसका संविधान के अनुच्छेद 163 से कोई लेना-देना नहीं है।

इसके नतीजे के तौर पर कोर्ट ने इस जनहित याचिका (PIL) को यह कहते हुए खारिज किया कि यह बेबुनियाद है और इसका मकसद सिर्फ़ पब्लिसिटी पाना था।

सुनवाई खत्म करते हुए चीफ जस्टिस टंडन ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा,

“अगर हम यह न कहें तो अपने फ़र्ज़ में कोताही होगी कि यह जनहित याचिका बेबुनियाद आधार पर दायर की गई और यह जनहित से जुड़े खास कानूनी उपाय की सरासर बर्बादी थी, जिस पर जुर्माना लगाया जा सकता था; लेकिन यह ध्यान में रखते हुए कि याचिकाकर्ता एक प्रैक्टिसिंग वकील हैं, हम इस मामले को यहीं छोड़ रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि आगे से वह किसी ऐसे वंचित व्यक्ति के लिए ही असली मुद्दा उठाएंगी, जिसके मौलिक या संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो, न कि ऐसी बेबुनियाद मुकदमेबाज़ी में शामिल होंगी।”

Case Title : Eleena Dash v. State of Odisha & Ors.

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