उड़ीसा हाईकोर्ट ने अपने पूर्व रजिस्ट्रार (न्यायिक) की सेवा पुस्तिका में दर्ज प्रतिकूल टिप्पणियों के मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि जिन गंभीर आरोपों के आधार पर अधिकारी की गोपनीय चरित्रावली में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज की गई, उन आरोपों पर हुई विभागीय कार्रवाई और उसमें दी गई सजा को बाद में अदालत पहले ही रद्द कर चुकी है। ऐसे में प्रतिकूल टिप्पणी के आधार की दोबारा समीक्षा जरूरी है।

जस्टिस मनाश रंजन पाठक और जस्टिस सिबो शंकर मिश्रा की खंडपीठ ने पूर्व रजिस्ट्रार (न्यायिक) ललित कुमार दास की याचिका मंजूर करते हुए मामले को चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा कि चीफ जस्टिस यह तय करें कि अधिकारी की ओर से प्रतिकूल टिप्पणियां हटाने के लिए दी गई अभ्यावेदन पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए या नहीं और क्या इसे पूर्ण पीठ के समक्ष रखा जाना उचित होगा।

अदालत ने कहा कि विभागीय कार्रवाई को रद्द किए जाने के बाद उस कार्रवाई से जुड़े वे तथ्य और सामग्री, जिनके आधार पर अधिकारी की गोपनीय चरित्रावली में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज की गई थी, अब कानूनी कसौटी पर कायम नहीं रह गए।

कोर्ट ने कहा,

“अधिकारी की गोपनीय चरित्रावली में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज करने का आधार बनी सामग्री कानून की कसौटी पर कायम नहीं रह सकी है। इसलिए वह आधार ही समाप्त हो गया।”

ललित कुमार दास वर्ष 1997 बैच के ओडिशा न्यायिक सेवा के अधिकारी हैं। उन्हें 13 जनवरी 2020 को हाईकोर्ट का रजिस्ट्रार (न्यायिक) नियुक्त किया गया। इस पद पर रहते हुए उनके खिलाफ प्रशासनिक फाइल के कुछ पन्ने कथित तौर पर गलत जगह रखे जाने और हाईकोर्ट के कर्मचारियों की पदोन्नति से जुड़े मामले में तत्कालीन कार्यवाहक चीफ जस्टिस को कथित रूप से गलत जानकारी देने के आरोप में विभागीय कार्रवाई शुरू की गई।

इसके बाद 14 फरवरी 2021 को उनका तबादला ढेंकनाल में अतिरिक्त जिला एवं विशेष न्यायाधीश (सतर्कता) के पद पर किया गया, जहां उन्होंने 26 जुलाई 2021 तक काम किया। 30 जुलाई 2021 से उन्हें कालाहांडी की पारिवारिक अदालत में जज नियुक्त किया गया।

अधिकारी ने वर्ष 2021 की गोपनीय चरित्रावली में दर्ज प्रतिकूल टिप्पणियों को चुनौती दी थी। उन्हें उस वर्ष “औसत” श्रेणी दी गई थी और विशेष रूप से उन्हें “विश्वसनीय नहीं” बताया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2021 में उन्होंने तीन अलग-अलग पदों पर काम किया।

हाईकोर्ट में रजिस्ट्रार (न्यायिक) के रूप में उन्होंने केवल 42 दिन काम किया और उस दौरान वे तत्कालीन चीफ जस्टिस के सीधे प्रशासनिक नियंत्रण में थे। तत्कालीन चीफ जस्टिस ने 4 जनवरी 2021 को पद संभाला था।

यह भी बताया गया कि ढेंकनाल में उनके कार्यकाल के लिए कोई गोपनीय चरित्रावली दर्ज नहीं की गई, जबकि कालाहांडी में उनके काम का आकलन प्रशासनिक जज ने “अच्छा” किया था। इसलिए उनका तर्क था कि पूरे वर्ष के लिए “औसत” आकलन मुख्य रूप से तत्कालीन चीफ जस्टिस की टिप्पणी के आधार पर किया गया।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि सामान्य नियम एवं परिपत्र आदेश के तहत किसी अधिकारी की गोपनीय चरित्रावली दर्ज करने के लिए संबंधित वरिष्ठ अधिकारी या प्रशासनिक जज के अधीन कम से कम चार महीने की सेवा आवश्यक है। इसके बावजूद तत्कालीन चीफ जस्टिस ने केवल 42 दिन के काम के आधार पर उनके संबंध में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज की।

खंडपीठ ने इस दलील में दम माना और ओडिशा हाईकोर्ट की ही एक अन्य खंडपीठ के मलय रंजन दास बनाम रजिस्ट्रार जनरल, ओडिशा हाईकोर्ट मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया।

हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि जिस समय तत्कालीन चीफ जस्टिस ने प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज की थी, उस समय उनके सामने विभागीय कार्रवाई से जुड़ी पूरी सामग्री मौजूद है। आरोप गंभीर थे और उपलब्ध सामग्री के आधार पर तत्कालीन चीफ जस्टिस के उस समय किए गए आकलन में कोई गलती नहीं मानी जा सकती।

लेकिन बाद में परिस्थितियां बदल गईं। हाईकोर्ट ने इसी वर्ष अलग कार्यवाही में विभागीय कार्रवाई में अधिकारी को दोषी ठहराने और उन पर लगाई गई बड़ी सजा रद्द की।

इसके बाद अदालत ने माना कि प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने के लिए अधिकारी की ओर से पहले दिए गए अभ्यावेदनों पर नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए।

खंडपीठ ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वह मामले को चीफ जस्टिस के समक्ष रखें। चीफ जस्टिस 2 दिसंबर 2022 और 17 अगस्त 2023 को दिए गए अभ्यावेदनों पर दोबारा विचार करेंगे और तय करेंगे कि गोपनीय चरित्रावली में दर्ज प्रतिकूल टिप्पणी हटाने के मुद्दे को पूर्ण पीठ के समक्ष रखा जाना चाहिए या नहीं।

इस तरह हाईकोर्ट ने याचिका मंजूर करते हुए अधिकारी के सेवा रिकॉर्ड में दर्ज प्रतिकूल टिप्पणी को सीधे हटाने के बजाय उसके आधार और बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए पुनर्विचार का रास्ता खोल दिया।

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