'हिस्ट्री-शीटर' होने से आरोपी के अनुच्छेद 21 के अधिकार कम नहीं हो जाते: कस्टोडियल डेथ केस में हाईकोर्ट का 3 पुलिसकर्मियों को जमानत से इनकार
उड़ीसा हाईकोर्ट ने बुधवार (14 अक्टूबर) को तीन पुलिसकर्मियों की जमानत याचिका खारिज की। इन पर आरोप है कि 2017 में उन्होंने एक व्यक्ति (जो आदतन अपराधी था) का सड़क पर पीछा किया और उसके साथ मारपीट की, जिसके कारण वह अपनी मोटरसाइकिल से गिर गया और उसकी मौत हो गई। [2026 लाइव लॉ (ओरी) 118]
जस्टिस वी. नरसिंह की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि किसी आरोपी को केवल इसलिए उसके संवैधानिक संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह एक "हिस्ट्री-शीटर" (आदतन अपराधी) है।
पीठ ने टिप्पणी की,
"मृतक को 'हिस्ट्री-शीटर' कहे जाने से उसे मिलने वाला संवैधानिक संरक्षण कम नहीं हो जाता। अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन का अधिकार' किसी व्यक्ति के पिछले रिकॉर्ड या सामाजिक स्थिति पर निर्भर नहीं करता है... इस मौके पर यह अदालत सर रॉबर्ट पील के उन अमर शब्दों को याद करना चाहेगी: 'हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पुलिसकर्मी ही जनता है और जनता ही पुलिसकर्मी है।' कानून के शासन से चलने वाले समाज में हिरासत के दौरान अनुशासन की उम्मीद की जाती है, न कि मौत की; क्योंकि हिरासत में होना, संवैधानिक अधिकारों को दरकिनार करने का कोई लाइसेंस नहीं है।"
30.01.2017 को याचिकाकर्ता - जो क्रमशः एक सब-इंस्पेक्टर, एक एडिशनल सब-इंस्पेक्टर और एक कांस्टेबल हैं - मृतक को गिरफ्तार करने गए। मृतक के खिलाफ 14 मामले दर्ज थे। आरोप है कि गिरफ्तारी से बचने के लिए वह अपनी मोटरसाइकिल से भागने की कोशिश कर रहा था, तभी वह कैनाल रोड पर गिर गया और उसे कई चोटें आईं। उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
मृतक की मां (जो शिकायतकर्ता भी हैं) ने उड़ीसा मानवाधिकार आयोग (OHRC) से संपर्क किया और हाईकोर्ट में रिट याचिका भी दायर की। उन्होंने हिरासत में हुई इस मौत के लिए मुआवजे की मांग की और दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने की अपील की। इसके बाद CID-CB ने मामले की जांच अपने हाथ में ले ली और याचिकाकर्ताओं के खिलाफ IPC की धाराओं 342, 323, 325, 302, 506 और 34 के तहत FIR दर्ज की।
याचिकाकर्ता 29.08.2025 से हिरासत में है। उसने कोरापुट के सेशन जज के समक्ष जमानत याचिका दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया। इसलिए राहत पाने के लिए उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने जोर देकर कहा कि मृतक की मौत पूरी तरह से एक दुर्घटना थी, जो मोटरसाइकिल से अचानक गिरने के कारण हुई। हालांकि राज्य ने कई गवाहों के बयानों का हवाला देते हुए इस तर्क का विरोध करने की कोशिश की, लेकिन याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि 'टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड' (पहचान परेड) बहुत लंबे समय के बाद आयोजित की गई और व्यापक तथा प्रतिकूल प्रचार को देखते हुए, इस पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कई गवाहों के बयानों का अवलोकन किया, जिनसे पता चलता है कि पुलिस ने मृतक को पाइप से पीटा था, जिसके कारण वह गिर गया। इसके बाद उसे और पीटा गया और फिर एक जीप में ले जाया गया। कोर्ट का मानना था कि आरोपों के संदर्भ में इन बयानों का काफी महत्व है, क्योंकि ये साफ तौर पर संकेत देते हैं कि मृतक का मोटरसाइकिल से गिरना कोई दुर्घटना नहीं है।
हिरासत में मौजूद व्यक्ति के अधिकारों की पुष्टि करने वाले कई पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए जस्टिस नरसिंह ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन का अधिकार' किसी व्यक्ति के पिछले रिकॉर्ड या सामाजिक स्थिति पर निर्भर नहीं करता है। हिरासत में हुई इस कथित मौत को बहुत गंभीरता से लिया जाना चाहिए, क्योंकि यहां आरोप उन लोगों पर लगे हैं, जो "नागरिकों के जीवन और शरीर के रक्षक" माने जाते हैं।
कोर्ट ने मृतक के शरीर पर पाई गई 24 चोटों पर भी ध्यान दिया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ताओं को आरोपों से बचाने और इस घटना को एक दुर्घटना का रूप देने के लिए कई मेडिकल राय (Medical Opinions) ली गईं। इसलिए आरोपों की प्रकृति, गवाहों के बयानों, मेडिकल रिपोर्ट, याचिकाकर्ताओं के पक्ष में कई मेडिकल राय लेने की कोशिश के आरोपों, और गवाहों पर अनुचित प्रभाव डाले जाने की संभावना को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को जमानत देने से इनकार करना उचित समझा। हालाँकि, मुख्य गवाहों के परीक्षण के बाद जमानत की अर्जी फिर से दाखिल करने की छूट दी गई।
Case Title : Debendra Kumar Paik v. State of Odisha & batch