उड़ीसा हाईकोर्ट ने शनिवार (31 अक्टूबर) को पत्नी बिद्याभारती पांडा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की। यह मामला जुलाई 2021 में परलाखेमुंडी स्थित सरकारी आवास पर पूर्व असिस्टेंट कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट (ACF) सौम्य रंजन महापात्रा की संदिग्ध मौत से जुड़ा है। [2026 LiveLaw (Ori) 122]

उन पर लगे गंभीर आरोपों को देखते हुए जस्टिस वी. नरसिंह की बेंच ने टिप्पणी की–

“रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखते हुए संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि याचिकाकर्ता को IPC की धारा 302 के तहत अपराध करने के लिए आरोपी बनाया गया। इस कथित अपराध की जड़ याचिकाकर्ता और सह-आरोपी (तत्कालीन DFO) के बीच अवैध संबंध बताए गए। सह-आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को इस कोर्ट ने खारिज कर दिया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी मुहर लगाई थी।”

यह मामला 12 जुलाई 2021 को परलाखेमुंडी में ACF सौम्य रंजन महापात्रा ('मृतक') की उनके सरकारी आवास पर हुई संदिग्ध मौत से जुड़ा है। मृतक की पत्नी के अनुसार, केरोसिन का इस्तेमाल करके कुछ कबाड़ का सामान जलाते समय वे बुरी तरह जल गए, जिससे उनकी मौत हो गई।

हालांकि, मृतक के पिता को इस मौत में कुछ गड़बड़ी का शक हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि मृतक की पत्नी के परलाखेमुंडी के तत्कालीन DFO के साथ अवैध संबंध थे। उनका यह भी आरोप था कि पत्नी ने DFO और एक रसोइए के साथ मिलकर साजिश रची और मृतक की हत्या की।

CID, CB की एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने इस मामले की जांच की और तीन आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 285 और 304-A के तहत चार्जशीट दाखिल की। ​​इस चार्जशीट के आधार पर SDJM ने मृतक की पत्नी के खिलाफ इन्हीं धाराओं के तहत संज्ञान लिया। हालाँकि, मृतक के पिता ने जाँच से असंतोष जताते हुए एक 'विरोध याचिका' (Protest Petition) दायर की।

सामग्री पर विचार करने के बाद SDJM ने इस विरोध याचिका को 'शिकायत' (Complaint) के रूप में लिया और शिकायतकर्ता पिता तथा अन्य गवाहों के शुरुआती बयान दर्ज किए। प्रथम दृष्टया हत्या और साजिश का मामला बनता दिखा। इसके आधार पर तीन आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 302 और धारा 120-B के तहत संज्ञान (Cognizance) लिया गया।

हालांकि मृतक की पत्नी और DFO ने संज्ञान लेने का आदेश रद्द कराने के लिए अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं, लेकिन हाईकोर्ट ने उन्हें खारिज कर दिया। पिछले साल हाईकोर्ट ने DFO और रसोइए की अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) याचिकाओं को भी खारिज कर दिया था।

याचिकाकर्ता ने पारलाखेमुंडी के SDJM के समक्ष CrPC की धारा 205 के तहत आवेदन दायर किया, जिसमें आरोपी की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट मांगी गई, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया। इस खारिज आदेश के खिलाफ, याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत मांगने की छूट दी थी। इसी के तहत उसने यह अग्रिम जमानत याचिका दायर की।

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई ठोस आरोप नहीं लगाया गया। इसके अलावा, उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 480(1) के प्रावधान के तहत महिला आरोपियों को मिलने वाले लाभ की मांग की, यह तर्क देते हुए कि जमानत से जुड़े प्रावधान अग्रिम जमानत याचिकाओं पर भी लागू होते हैं।

दूसरी ओर, मृतक के पिता (शिकायतकर्ता) और राज्य के वकीलों ने इस याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ परिस्थितियां स्पष्ट हैं; मृतक को याचिकाकर्ता और तत्कालीन DFO से अपनी जान को खतरा महसूस हो रहा था, क्योंकि उसे उनके अवैध संबंधों के बारे में पता चल गया।

यह भी बताया गया कि जिस समय मृतक 95% तक जल गया था, उस समय याचिकाकर्ता उसके साथ अकेली थी। यह बताया गया कि SDJM ने प्रोटेस्ट याचिका दायर होने के बाद मृतक के पिता और अन्य गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद IPC की धारा 302 के तहत मामले का संज्ञान (Cognizance) ले लिया। इस प्रकार, याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप अब केवल अटकलें नहीं रह गए हैं, बल्कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) न्यायिक संतुष्टि का आधार बन गए।

इन दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को ध्यान में रखते हुए जस्टिस नरसिंह ने टिप्पणी की–

“चूंकि IPC की धारा 302 के तहत संज्ञान लेने का आदेश अंतिम हो चुका है, और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखते हुए, साथ ही सह-आरोपी—विशेष रूप से तत्कालीन DFO संग्राम केशरी बेहरा—की अग्रिम जमानत (Pre-Arrest Bail) खारिज होने के संदर्भ में (जिनके साथ मिलकर वर्तमान याचिकाकर्ता द्वारा अपराध करने का आरोप है), यह अदालत याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत देने के लिए कोई अलग आधार नहीं पाती है। 'उबी एडेम रेशियो, इबी एडेम जूस' (Ubi eadem ratio, ibi idem jus)—यानी जहाँ कारण समान हो, वहाँ न्याय भी समान होता है।”

तदनुसार, अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया गया।

Case Title : Bidyabharati Panda v. State of Odisha & Anr

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