उड़ीसा हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि जिस हाईकोर्ट जज का ट्रांसफर हो जाता है और जो बाद में किसी दूसरे हाई कोर्ट से रिटायर होते हैं, वे अपने मूल हाईकोर्ट या राज्य से रिटायरमेंट लाभ/भत्ते लेने का विकल्प चुन सकते हैं। शर्त यह है कि वे किसी अन्य हाईकोर्ट से ये लाभ न ले रहे हों। [2026 लाइव लॉ (ओरि) 123]

संवैधानिक न्यायालय के रिटायर जज को सम्मानजनक जीवन देने की आवश्यकता पर जोर देते हुए डॉ. जस्टिस संजीव कुमार पाणिग्रही और जस्टिस मुरहरी श्री रमन की डिवीजन बेंच ने कहा,

“यह याद रखना उचित होगा कि एक जज, अपने कार्यकाल के दौरान, एक ऐसी जिम्मेदारी निभाता है, जो बहुत कठिन और चुनौतीपूर्ण होती है। इस काम में लंबे समय तक काम करना, लगातार दिमाग का इस्तेमाल करना और संस्था तथा न्याय मांगने वाले लोगों के प्रति कर्तव्य की गहरी भावना रखना शामिल होता है। जब ऐसी सेवा समाप्त होती है तो कम-से-कम यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि जिस व्यक्ति ने अपने जीवन के इतने साल उस संस्था को दिए हैं, वह सम्मान के साथ रिटायर हो सके और उसे अपनी बुनियादी जरूरतों को लेकर कोई चिंता न हो।”

उड़ीसा हाईकोर्ट के पूर्व जज, जस्टिस चित्त रंजन डैश ने रिट याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने ओडिशा सरकार के गृह विभाग द्वारा 31.07.2025 को जारी आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के तहत उन्हें अपने मूल हाईकोर्ट (उड़ीसा हाईकोर्ट) से मेडिकल सुविधाएं लेने की अनुमति तो दी गई, लेकिन रिटायर हाईकोर्ट जज को मिलने वाले अन्य भत्तों को मंजूर नहीं किया गया।

गौरतलब है कि याचिकाकर्ता को 07 अक्टूबर 2009 को उड़ीसा हाईकोर्ट में जज के रूप में नियुक्त किया गया। इसके बाद 01.06.2022 की अधिसूचना के जरिए उनका ट्रांसफर कलकत्ता हाईकोर्ट में कर दिया गया, जहां उन्होंने 20.06.2022 को अपना पदभार संभाला। वे 20.05.2024 को अपने पद से रिटायर हुए। 'जस्टिस वी.एस. दवे (सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रिटायर जज संघ के अध्यक्ष) बनाम कुसुमजीत सिद्धू व अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 15.04.2025 के अपने आदेश में स्पष्टीकरण दिया था। इस स्पष्टीकरण के आधार पर तर्क दिया गया कि यदि किसी जज का एक हाईकोर्ट से दूसरे हाई कोर्ट में तबादला (ट्रांसफर) हुआ है तो 'संबंधित राज्य सरकार' वह राज्य हो सकती है, जहां जज की पहली नियुक्ति हुई थी, या फिर वह राज्य जहां से जज रिटायर हुए थे।

याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि 24.05.2025 की अधिसूचना के जरिए, उड़ीसा राज्य सरकार ने उड़ीसा हाईकोर्ट के स्थानांतरित जजों को यह विकल्प दिया कि वे ओडिशा राज्य से सेवानिवृत्ति लाभ (Retiral Benefits) प्राप्त कर सकते हैं, बशर्ते वे उस हाईकोर्ट या राज्य से ये लाभ न ले रहे हों, जहां उनका तबादला हुआ था।

राज्य ने उसी अधिसूचना और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले भत्तों से जुड़े पहले के विभागीय आदेशों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि इस अधिसूचना की शर्तें उन जजों पर लागू नहीं होतीं, जो किसी दूसरे हाईकोर्ट से रिटायर हुए हैं।

यहां मुख्य सवाल यह था कि क्या याचिकाकर्ता, जिसकी शुरुआती नियुक्ति उड़ीसा हाईकोर्ट के जज के रूप में हुई और जिसने अपने रिटायरमेंट लाभ अपने मूल हाई कोर्ट (Parent Court) से लेने का विकल्प चुना है, वह उड़ीसा राज्य से भत्तों का दावा कर सकता है—भले ही वह कलकत्ता हाईकोर्ट से रिटायर हुआ हो?

खंडपीठ ने 'जस्टिस वी.एस. दवे' (उपर्युक्त) और 'पी. रामकृष्णम राजू बनाम भारत संघ' मामलों में दिए गए कई फैसलों पर ध्यान दिया। इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार राज्य सरकारों से कहा था कि वे देश भर के रिटायर हाईकोर्ट जजों को लाभ देने के लिए एक समान मानदंड (Uniform Criteria) अपनाएं।

खंडपीठ ने गौर किया कि 24.05.2025 की उक्त अधिसूचना के तहत राज्य सरकार ने उड़ीसा हाईकोर्ट के रिटायर चीफ जस्टिस/जजों (या उनके जीवनसाथी) को घरेलू सहायकों, ड्राइवर, सचिवीय सहायता, सुरक्षा और टेलीफोन सुविधाओं के लिए निश्चित मासिक राशि देने की व्यवस्था की। यह सुविधा उन्हें तभी मिलेगी, जब वे किसी अन्य हाईकोर्ट से ऐसी ही कोई सुविधा न ले रहे हों। अदालत ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि उक्त शर्त के आधार पर उड़ीसा हाईकोर्ट के किसी जज को लाभ प्राप्त करने से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता, केवल इसलिए कि उनका स्थानांतरण किसी दूसरे हाईकोर्ट में कर दिया गया था।

अदालत ने कहा कि राज्य की व्याख्या के अनुसार, स्थानांतरित (ट्रांसफर किए गए) जज को अपने मूल (पैरेंट) हाईकोर्ट से मेडिकल सुविधाएं पाने का हकदार तो माना जाएगा, लेकिन रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले अन्य भत्तों से उसे सिर्फ इसलिए वंचित कर दिया जाएगा, क्योंकि वह कहीं और से रिटायर हुआ है।

अदालत ने कहा,

"नोटिफिकेशन की भाषा से ऐसा कोई स्पष्ट अपवर्जन (Exclusion) नहीं दिखता। साथ ही ऐसा कोई तार्किक आधार भी नहीं बताया गया, जो इस अदालत में नियुक्त जज के साथ इस अदालत के अन्य रिटायर जजों की तुलना में अलग व्यवहार करने को सही ठहरा सके—खासकर तब, जब संबंधित जज ने यहीं से लाभ लेना चुना हो और वह किसी अन्य हाई कोर्ट से ऐसे ही या समान लाभ न ले रहा हो।"

वर्तमान मामले पर आते हुए अदालत ने आगे कहा,

"याचिकाकर्ता के दावे को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वह कलकत्ता हाईकोर्ट से रिटायर हुआ है... याचिकाकर्ता इस अदालत के माध्यम से उड़ीसा राज्य से रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले भत्तों का हकदार है, बशर्ते वह कलकत्ता हाईकोर्ट या किसी अन्य हाईकोर्ट से ऐसी ही या समान सुविधाएं न ले रहा हो।"

इसके अनुसार, उड़ीसा सरकार के गृह विभाग द्वारा जारी आदेश को रद्द कर दिया गया। साथ ही, यह निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता को रिटायर हाईकोर्ट जज के रूप में मिलने वाले सभी लाभ, बकाया राशि (Arrears) सहित, आठ सप्ताह के भीतर प्रदान किए जाएं।

अपनी बात समाप्त करने से पहले अदालत ने कड़े शब्दों में टिप्पणी की,

"रिटायर जजों को दी जाने वाली सुविधाएं कोई एहसान या रियायत नहीं हैं। इनका उद्देश्य जीवन भर जनसेवा करने के बाद रिटायरमेंट के बाद के वर्षों में एक तरह का सहारा और निरंतरता प्रदान करना है। मेडिकल सहायता, घरेलू मदद और टेलीफोन जैसी सुविधाएं रिटायरमेंट के बाद के जीवन में वास्तव में बहुत काम आती हैं। एक रिटायर जज को उन सुविधाओं को पाने के लिए बार-बार सरकारी विभागों के चक्कर न लगाने पड़ें, पत्र-व्यवहार न करना पड़े या प्रशासनिक अड़चनों का सामना न करना पड़े—खासकर तब, जब राज्य ने खुद ही इन सुविधाओं को जरूरी माना है... कोई संस्था अपने पूर्व कर्मचारियों के साथ कैसा व्यवहार करती है, यह उस संस्था के अपने चरित्र को भी दर्शाता है। न्यायपालिका और उसके सदस्यों के बीच का रिश्ता उस दिन खत्म नहीं हो जाता, जिस दिन कोई जज अपना पद छोड़ता है।"

Case Title : Shri Chitta Ranjan Dash v. State of Odisha & Ors

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