त्रिपुरा हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी के खिलाफ लंबित विभागीय कार्यवाही उसे प्रमोशन मिलने से रोक सकती है, भले ही उस पर पहले लगाई गई कोई सजा रद्द की गई हो।

त्रिपुरा पुलिस सेवा (TPS) ग्रेड-II के पद पर पूर्व-प्रभावी प्रमोशन की मांग करने वाले एक पुलिस इंस्पेक्टर की याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि जब तक बाद में शुरू हुई विभागीय कार्यवाही पूरी नहीं हो जाती तब तक प्रमोशन देने का कोई आदेश नहीं दिया जा सकता।

जस्टिस बिस्वजीत पालित ने टिप्पणी की,

"चूंकि याचिकाकर्ता के खिलाफ एक विभागीय कार्यवाही लंबित है, इसलिए जब तक वह कार्यवाही पूरी नहीं हो जाती तब तक याचिकाकर्ता के पक्ष में प्रमोशन का कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता।"

याचिकाकर्ता, त्रिपुरा पुलिस के इंस्पेक्टर सुरासेन त्रिपुरा ने त्रिपुरा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर त्रिपुरा पुलिस सेवा (TPS) ग्रेड-II के पद पर पूर्व-प्रभावी प्रमोशन की मांग की थी। उन्होंने यह मांग तब की, जब 2021 और 2023 में उनसे जूनियर कई अधिकारियों को प्रमोशन दे दिया गया।

शुरुआत में विभागीय कार्यवाही के कारण उनका प्रमोशन रोक दिया गया। उस कार्यवाही के परिणामस्वरूप उन्हें एक टाइम-स्केल इंक्रीमेंट (वेतन वृद्धि) न मिलने की सजा दी गई (जिसका संचयी प्रभाव नहीं था)।

बाद में 6 सितंबर 2024 को हाई कोर्ट ने वह सजा रद्द की और निर्देश दिया कि उन्हें वे सभी लाभ दिए जाएं, मानो उन पर कभी कोई सजा लगाई ही नहीं गई।

हालांकि, अधिकारियों ने उन्हें प्रमोशन नहीं दिया। उन्होंने 24 जनवरी 2024 को शुरू हुई एक अन्य विभागीय कार्यवाही का हवाला दिया जो यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़ी है।

इससे निराश होकर उन्होंने पूर्व-प्रभावी प्रमोशन और उससे जुड़े लाभों की मांग करते हुए यह रिट याचिका दायर की।

हाईकोर्ट ने पाया कि भले ही याचिकाकर्ता पर लगाई गई पिछली सजा रद्द की गई और उनके वित्तीय लाभ बहाल कर दिए गए, लेकिन 24 जनवरी 2024 को शुरू हुई एक और विभागीय कार्यवाही अभी भी लंबित है।

कोर्ट ने कहा कि जब तक यह लंबित कार्यवाही पूरी नहीं हो जाती, तब तक वह न तो डिपार्टमेंटल प्रमोशन कमिटी' (DPC) की समीक्षा का निर्देश दे सकता है और न ही प्रमोशन देने का आदेश दे सकता है।

इसके अनुसार कोर्ट ने रिट याचिका खारिज की और अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे फैसले की तारीख से छह महीने के भीतर विभागीय जांच पूरी करें। यदि ऐसा नहीं होता है, तो यह कार्यवाही स्वतः समाप्त मानी जाएगी। जांच पूरी होने के बाद याचिकाकर्ता को अधिकारियों के समक्ष अपना पक्ष रखने की छूट दी गई।

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