त्रिपुरा हाईकोर्ट ने पत्नी को अंतरिम गुजारा भत्ता देने से इनकार करने वाला फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत गुजारा भत्ता संबंधी प्रावधानों के उद्देश्य को समझने में विफल रही, जबकि इन प्रावधानों का मकसद परित्यक्त और संकटग्रस्त महिलाओं की सुरक्षा करना है।

जस्टिस बिस्वजीत पालित ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने बिना साक्ष्य दर्ज किए यह निष्कर्ष निकाल लिया कि पत्नी ने अपनी मर्जी से वैवाहिक घर छोड़ा था। हाईकोर्ट ने पति को मुख्य गुजारा भत्ता याचिका के निस्तारण तक पत्नी को ₹8,000 प्रतिमाह अंतरिम गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया।

मामले में पत्नी मेघाली देबनाथ ने अपने पति मृण्मय देबनाथ के खिलाफ गुजारा भत्ता याचिका दाखिल की थी। पत्नी का आरोप था कि पति और उसके परिवार के सदस्यों ने उसके साथ शारीरिक क्रूरता की, जिसके कारण उसे वैवाहिक घर छोड़ना पड़ा।

पत्नी ने दावा किया कि उसका पति व्यवसाय और निजी ट्यूशन के जरिए करीब ₹80,000 प्रतिमाह कमाता है, जबकि उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है।

अगरतला फैमिली कोर्ट ने 8 अप्रैल, 2026 को पत्नी की अंतरिम गुजारा भत्ता की मांग खारिज की थी। कोर्ट ने माना था कि पत्नी बिना पर्याप्त कारण के अपनी मर्जी से वैवाहिक घर छोड़कर गई। इस आदेश को चुनौती देते हुए पत्नी ने त्रिपुरा हाईकोर्ट का रुख किया।हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने बिना साक्ष्य दर्ज किए पत्नी के घर छोड़ने को स्वैच्छिक मान लिया था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पति ने विवाह से इनकार नहीं किया और न ही अपनी कथित ₹80,000 प्रतिमाह की आय के बारे में पर्याप्त स्पष्टीकरण दिया। दूसरी ओर, पत्नी के कमाने का कोई प्रथम दृष्टया साक्ष्य भी उपलब्ध नहीं था।

हाईकोर्ट ने दोहराया कि गुजारा भत्ता की कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है और इसमें वैवाहिक विवादों के प्रत्येक छोटे-बड़े पहलू की विस्तृत जांच आवश्यक नहीं है।

जस्टिस पालित ने कहा कि दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह स्पष्ट होता है कि ट्रायल कोर्ट आदेश पारित करते समय विधायिका द्वारा परित्यक्त और संकटग्रस्त महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए प्रावधानों के उद्देश्य और महत्व को समझने में विफल रहा।

इस आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया और पति को पत्नी के पक्ष में ₹8,000 प्रतिमाह अंतरिम गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया। इसमें घरेलू हिंसा की कार्यवाही के तहत पहले से निर्धारित ₹4,000 की राशि भी शामिल होगी।

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