त्रिपुरा हाईकोर्ट ने पुलिस थाने के भीतर मारपीट और प्रताड़ना के एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वह इस मामले में प्रभावी हस्तक्षेप इसलिए कर सका, क्योंकि घटना का CCTV फुटेज उपलब्ध है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस थानों में CCTV कैमरों का काम करना और उनकी रिकॉर्डिंग सुरक्षित रहना बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे थाने के भीतर होने वाली घटनाओं की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।

चीफ जस्टिस एम.एस. रामचंद्र राव और जस्टिस बिस्वजीत पालित की डिवीजन बेंच ने कहा कि कोर्ट इस मामले में प्रभावी रूप से हस्तक्षेप केवल इसलिए कर सका, क्योंकि 4 और 5 अप्रैल 2026 की दरम्यानी रात ईस्ट अगरतला पुलिस स्टेशन के भीतर हुई घटनाओं का CCTV फुटेज उपलब्ध है।

मामला उस घटना से जुड़ा है जिसमें याचिकाकर्ता के बेटे सैकत साहा को कथित तौर पर अगरतला नगर निगम के कर्मचारी रवींद्रनाथ घोष और स्पेशल पुलिस ऑफिसर जॉय देबनाथ जबरन ईस्ट अगरतला पुलिस स्टेशन ले गए। आरोप था कि 4 और 5 अप्रैल की दरम्यानी रात पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में सैकत के साथ मारपीट की गई, उसे अपमानित किया गया और प्रताड़ित किया गया।

घटना पुलिस स्टेशन में लगे CCTV कैमरों में रिकॉर्ड हुई थी। हाईकोर्ट ने 6 मई 2026 को इन कैमरों की रिकॉर्डिंग जब्त करने का निर्देश दिया।

इसके बाद 14 मई को एक इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस की अध्यक्षता में विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया। SIT ने 16 जून को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें प्रथमदृष्टया रवींद्रनाथ घोष और जॉय देबनाथ के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि की गई।

राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि ईस्ट अगरतला पुलिस स्टेशन के पुलिस अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए, उन्हें निलंबित किया गया और उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की गई। वहीं, घोष और देबनाथ की सेवाएं बाद में समाप्त किए जाने की जानकारी दी गई और उनके खिलाफ संबंधित आपराधिक अदालत में आरोप पत्र भी दाखिल किया गया।

कोर्ट को बाद में यह भी बताया गया कि घटना के समय ड्यूटी पर मौजूद ईस्ट अगरतला पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी और अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी निलंबन के बाद आरोप तय किए गए और उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही जारी है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने एक अन्य याचिका, स्मिता लिपिका लोढ़ बनाम त्रिपुरा राज्य एवं अन्य, का भी उल्लेख किया। उस मामले में भी पुलिस स्टेशन के भीतर मारपीट का आरोप लगा, लेकिन घटना का CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं हो सका था। कोर्ट को बताया गया था कि घटना से तीन दिन पहले और तीन दिन बाद तक कैमरे काम नहीं कर रहे थे।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति दोबारा न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए पुलिस थानों में CCTV कैमरों की कार्यप्रणाली के मुद्दे पर स्पष्ट निर्देश देना जरूरी है।

कोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फैसले परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह एवं अन्य का उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने देश के प्रत्येक पुलिस स्टेशन में CCTV कैमरे लगाने का निर्देश दिया था। इन कैमरों की कवरेज में प्रवेश और निकास द्वार, लॉकअप, गलियारे, रिसेप्शन क्षेत्र, बरामदे, इंस्पेक्टर और सब-इंस्पेक्टर के कमरे, स्टेशन हॉल तथा वॉशरूम और टॉयलेट के बाहर के क्षेत्र शामिल किए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि CCTV सिस्टम में नाइट विजन के साथ ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग की सुविधा होनी चाहिए। रिकॉर्डिंग सिस्टम में फुटेज 18 महीने तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि 18 महीने तक रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने में सक्षम उपकरण उपलब्ध नहीं हों तो तकनीकी रूप से संभव अधिकतम अवधि तक, लेकिन किसी भी स्थिति में एक वर्ष से कम नहीं, फुटेज सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पुलिस स्टेशन के स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) पर CCTV कैमरों की कार्यप्रणाली, रखरखाव और रिकॉर्डिंग की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से डाली है। कैमरे खराब होने या काम नहीं करने की स्थिति में SHO को तत्काल जिला स्तरीय निगरानी समिति को इसकी जानकारी देनी होगी। साथ ही, उस अवधि में पुलिस स्टेशन में की गई गिरफ्तारियों और पूछताछ का विवरण भी उपलब्ध कराना होगा।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि SHO को CCTV कैमरों की कार्यशील स्थिति का आकलन करना, खराब कैमरों को ठीक कराने के लिए आवश्यक कदम उठाना और CCTV डेटा के रखरखाव, बैकअप तथा खराबी दूर करने के लिए जिम्मेदार रहना होगा।

डिवीजन बेंच ने निर्देश दिया कि परमवीर सिंह सैनी मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों को पूरी तरह लागू किया जाए। राज्य को न केवल सभी पुलिस थानों में निर्धारित CCTV कैमरे लगाने होंगे, बल्कि संबंधित पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी को कैमरों की कार्यप्रणाली, रखरखाव और रिकॉर्डिंग के लिए जिम्मेदार भी बनाया जाएगा।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि किसी पुलिस स्टेशन में CCTV कैमरे काम नहीं कर रहे हों तो उस अवधि में की गई गिरफ्तारियों और पूछताछ की जानकारी प्रभारी अधिकारी जिला स्तरीय निगरानी समिति को देगा और संबंधित रिकॉर्ड भी अनिवार्य रूप से समिति को भेजेगा।

हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि CCTV कैमरों के खराब या काम नहीं करने की सूचना मिलने पर जिला स्तरीय निगरानी समिति तत्काल राज्य स्तरीय निगरानी समिति से उपकरणों की मरम्मत और आवश्यक नए उपकरणों की खरीद का अनुरोध करेगी। साथ ही, CCTV डेटा के रखरखाव, बैकअप और खराबी दूर करने की जिम्मेदारी पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी की होगी।

इन निर्देशों और अपने पूर्व आदेशों को दोहराते हुए हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा किया।

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