तेलंगाना हाईकोर्ट ने सोमवार को विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता का नाम बिना नोटिस दिए मतदाता सूची से हटाए जाने के मामले में चुनाव आयोग से जवाब मांगा। कोर्ट ने यह भी पूछा कि दूसरे याचिकाकर्ता को जारी नोटिस का जवाब देने के बाद उसके मामले में क्या कार्रवाई की गई।

जस्टिस पी. सैम कोशी और जस्टिस नरसिंह राव नंदिकोंडा की खंडपीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें मतदाताओं के गणना प्रपत्रों में कथित मामूली विसंगतियों के आधार पर उन्हें नोटिस जारी करने की प्रक्रिया को चुनौती दी गई। याचिका में दावा किया गया कि मतदाताओं की पहचान, उनके रिकॉर्ड में विसंगतियां तलाशने और उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिए स्वचालित आंकड़ा मिलान प्रणाली का इस्तेमाल किया जा रहा है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रक्रिया कानून के किसी स्पष्ट प्राधिकार के बिना अपनाई जा रही है। संबंधित भौतिक दस्तावेजों का उचित सत्यापन नहीं किया जा रहा और निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों द्वारा स्वतंत्र रूप से दिमाग लगाने के बजाय स्वचालित प्रणाली के आधार पर कार्रवाई की जा रही है। याचिका में ECINET/ERONET नामक प्रणाली की कार्यप्रणाली, उसके इस्तेमाल की पद्धति और उससे जुड़े विवरण सार्वजनिक किए जाने की भी मांग की गई।

याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट एल. रविचंदर ने दलील शुरू करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां के हालिया बयान का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जस्टिस ने भी इस पद्धति पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी भारतीय नागरिक के व्यक्तित्व से वोट देने और मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार को अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने दलील दी कि संविधान नागरिकों के दो वर्ग वोट देने के अधिकार वाले और वोट के अधिकार से वंचित नागरिक नहीं बनाता और ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिससे बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित किया जाए, संविधान के खिलाफ होगी।

गौरतलब है कि रविवार को नालसार में आयोजित कार्यक्रम में जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा था कि भारतीय नागरिक का मतदान का अधिकार संविधान की मूल संरचना का अभिन्न हिस्सा है और नागरिकों को बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मनमानी तथा संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 का उल्लंघन होगी।

रविचंदर ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसे लोग हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए। इसलिए मामले में न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी है। चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ताओं में से एक को नोटिस जारी किया गया।

इस पर रविचंदर ने स्पष्ट किया कि चुनौती केवल किसी एक नोटिस तक सीमित नहीं है, बल्कि SIR की पूरी प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। उनका आरोप था कि इस प्रक्रिया में AI आधारित प्रणाली का इस्तेमाल किया जा रहा है और यह स्पष्ट करने की कोई व्यवस्था नहीं है कि किसी मतदाता को नोटिस क्यों जारी किया गया, उसके रिकॉर्ड में क्या बदलाव किए गए या उसके जवाब पर किस तरह विचार किया गया।

कोर्ट ने चुनाव आयोग से विशेष रूप से पूछा कि पहले याचिकाकर्ता का नाम बिना नोटिस जारी किए मतदाता सूची से क्यों हटाया गया। साथ ही दूसरे याचिकाकर्ता के मामले में नोटिस का जवाब दाखिल करने के बाद क्या कार्रवाई की गई, इसकी जानकारी भी मांगी। कोर्ट ने कहा कि यदि दूसरे याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है तो उसके बारे में भी बताया जाए।

चुनाव आयोग की वकील ने बताया कि दूसरे याचिकाकर्ता को वर्तमान और पिछली मतदाता सूची में उसके पिता के नाम में अंतर को लेकर नोटिस दिया गया और 15 सितंबर को सुनवाई के लिए बुलाया गया।

इस पर जस्टिस कोशी ने मौखिक रूप से कहा कि उन्हें भी व्यक्तिगत रूप से ऐसा नोटिस मिला था और उन्होंने उसका जवाब दिया। उसमें सवाल यह था कि उनका नाम पिछली मतदाता सूची में नहीं था।

कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता नोटिस में उठाई गई आपत्ति का स्पष्टीकरण दे देता है। उसके बाद भी उसके खिलाफ प्रतिकूल कार्रवाई की जाती है तो वह अदालत का रुख कर सकता है। कोर्ट ने पूछा कि आखिर इसमें कठिनाई क्या है।

इस पर रविचंदर ने कहा कि समस्या यह है कि याचिकाकर्ता को ऐसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है, जो उनके अनुसार वैज्ञानिक आधार से रहित प्रतीत होती है।

कोर्ट ने जब पूछा कि क्या यह दर्ज किया जाए कि याचिकाकर्ता ने नोटिस का जवाब देने से इनकार किया तो वकील ने स्पष्ट किया कि दूसरे याचिकाकर्ता ने नोटिस का जवाब दिया था, जबकि पहले याचिकाकर्ता को कोई नोटिस ही नहीं मिला।

रविचंदर ने कहा कि इसी वजह से याचिका केवल नोटिस को चुनौती नहीं देती, बल्कि पूरी SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाती है। उनका कहना था कि नोटिस का जवाब देने के बाद की प्रक्रिया में भी पारदर्शिता नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि 15 सितंबर को दूसरे याचिकाकर्ता जब सुनवाई के लिए पहुंचे तो केवल उनके दस्तावेज लिए गए और तस्वीरें खींची गईं, जबकि उन्हें अपनी ओर से कोई अतिरिक्त स्पष्टीकरण देने का अवसर नहीं मिला।

इस पर कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि संबंधित अधिकारी ने जो दस्तावेज मांगा, उसे ही प्रस्तुत करना है। कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि दूसरे याचिकाकर्ता के जवाब देने के बाद क्या अधिकारियों ने आगे कोई निर्णय लिया। कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता ने नाम में अंतर को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण दे दिया तो अधिकारियों को उस पर निर्णय लेना चाहिए। चुनाव आयोग की वकील ने कहा कि वह इस संबंध में निर्देश प्राप्त करेंगी।

पहले याचिकाकर्ता को नोटिस जारी नहीं किए जाने के सवाल पर चुनाव आयोग की वकील ने कहा कि वह मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए फॉर्म-6 दाखिल कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने खुद नाम में अंतर होने की बात स्वीकार की। हालांकि कोर्ट ने कहा कि पहले याचिकाकर्ता को यह पता ही नहीं है कि उसका नाम क्यों हटाया गया, क्योंकि उसे इस संबंध में कोई नोटिस तक जारी नहीं किया गया।

चुनाव आयोग की ओर से इस पर भी निर्देश लेने की बात कही गई। वहीं, रविचंदर ने कहा कि जिस प्रक्रिया के आधार पर निर्णय लिए जा रहे हैं, उस पर भी आयोग से जवाब मांगा जाना चाहिए, क्योंकि उनके अनुसार मतदाताओं के जवाब के आधार पर निष्कर्ष निकालने में मानवीय हस्तक्षेप नहीं है।

कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि इस तरह की प्रक्रिया में पक्षपात की संभावना नहीं होगी। इस पर रविचंदर ने कहा कि यह प्रक्रिया बेहतर हो सकती है, लेकिन फिलहाल ऐसी प्रक्रिया को कानून में मान्यता प्राप्त नहीं है।

हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को तय की।

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