संदिग्ध परिस्थितियों में केवल गवाह की गवाही से वसीयत साबित नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी वसीयत (Will) के निष्पादन को लेकर संदिग्ध परिस्थितियां मौजूद हों, तो केवल गवाह (Attesting Witness) की गवाही के आधार पर उसे वैध नहीं माना जा सकता। वसीयत का समर्थन करने वाले पक्ष (Propounder) पर यह अतिरिक्त दायित्व है कि वह सभी संदेहों को दूर कर अदालत को संतुष्ट करे कि वसीयत वसीयतकर्ता की स्वतंत्र और समझ-बूझकर व्यक्त की गई अंतिम इच्छा थी।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए वर्ष 1974 की एक पंजीकृत वसीयत को अमान्य ठहरा दिया। अदालत ने पाया कि वसीयतकर्ता एक अशिक्षित किसान था, जो केवल अंगूठा लगाना जानता था, और वसीयत से जुड़ी कई संदिग्ध परिस्थितियों का प्रतिवादी संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।
मामला छज्जू राम की संपत्ति से जुड़ा था। उनकी पत्नी भाम्बो देवी ने दावा किया कि उनके पति की मृत्यु बिना वसीयत के हुई थी, इसलिए वह उनकी एकमात्र क्लास-I उत्तराधिकारी हैं। दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने 1974 की पंजीकृत वसीयत के आधार पर पूरी संपत्ति पर दावा किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वसीयत में पत्नी को पूरी तरह संपत्ति से वंचित कर दिया गया था, जबकि पूरी संपत्ति ऐसे लोगों के नाम कर दी गई थी जो निकट संबंधी भी नहीं थे। इसके अलावा, वसीयत में लाभार्थियों को भतीजा बताया गया, लेकिन इसका कोई साक्ष्य नहीं था। दस्तावेज में बिना प्रमाणीकरण के किए गए संशोधनों ने भी वसीयत की प्रामाणिकता पर संदेह पैदा किया।
इन परिस्थितियों में अदालत ने कहा कि वसीयत को साबित करना केवल हस्ताक्षर या गवाह की गवाही तक सीमित नहीं है। जहां संदेहास्पद परिस्थितियां हों, वहां वसीयत का समर्थन करने वाले पक्ष को उन सभी संदेहों का संतोषजनक स्पष्टीकरण देना होगा।
इन्हीं कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को बहाल कर दिया तथा भाम्बो देवी को विवादित संपत्ति का वैध मालिक घोषित किया।