सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड PSC में नियुक्त रिटायर सरकारी कर्मचारियों के वेतन से पेंशन कटौती का नियम बरकरार रखा
सुप्रीम कोर्ट ने नियम की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी, जिसके तहत उत्तराखंड लोक सेवा आयोग (UKPSC) के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त रिटायर सरकारी कर्मचारियों के वेतन से उनकी पेंशन की राशि काट ली जाती है।
कोर्ट ने कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान पेंशन को केवल कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है और कार्यकाल खत्म होने के बाद इसे फिर से बहाल कर दिया जाता है।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2010 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें 'उत्तराखंड लोक सेवा आयोग (सेवा की शर्तें) नियमावली, 2004' के नियम 7(2) को असंवैधानिक करार दिया गया था। हाईकोर्ट का मानना था कि यह नियम संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 39(d) का उल्लंघन करता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि संवैधानिक पद के लिए मिलने वाले वेतन से पिछली सरकारी सेवा की पेंशन काटना, "समान काम के लिए समान वेतन" के सिद्धांत का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट की राय से असहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पेंशन की कटौती का मतलब पेंशन का लाभ छीनना नहीं है, बल्कि आयोग के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में काम करने की अवधि के दौरान इसे केवल कुछ समय के लिए रोकना है।
कोर्ट ने कहा,
"यहां 'समान काम के लिए समान वेतन' के सिद्धांत के उल्लंघन का सवाल ही नहीं उठता।"
साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि इस नियम को असंवैधानिक मानकर हाई कोर्ट ने गलत निष्कर्ष निकाला था।
पद स्वीकार करने के बाद सरकारी कर्मचारी सेवा की शर्तों से पीछे नहीं हट सकता: सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई सरकारी कर्मचारी सेवा की शर्तों को स्वीकार करने के बाद, बाद में उन्हीं शर्तों पर सवाल नहीं उठा सकता।
बेंच ने कहा,
"...कोई सरकारी कर्मचारी या कोई अन्य कर्मचारी, जो किसी पद को स्वीकार कर लेता है, उसे बाद में उस पद से जुड़ी सेवा शर्तों और नियमों से पीछे हटने या उन पर आपत्ति जताने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"
प्रतिवादी 2006 में भारतीय सेना से लेफ्टिनेंट जनरल के पद से रिटायर हुए थे। उन्हें राज्य लोक सेवा आयोग (PSC) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग (सेवा की शर्तें) विनियम, 2004 (“विनियम”) का नियम 7(2) - जो प्रतिवादी के अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभालने के समय लागू था - “वेतन घटा पेंशन” (pay minus pension) के सिद्धांत के आधार पर वेतन तय करता है। इसका मतलब यह है कि भारतीय सेना से रिटायरमेंट पर प्रतिवादी को जो पेंशन मिलनी थी, उसे उनके अध्यक्ष के वर्तमान कार्यकाल के दौरान रोक दिया जाएगा, और अध्यक्ष पद के वेतन में से पेंशन की राशि घटा दी जाएगी।
संक्षेप में मामला
रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति होने पर वेतन की राशि तय करने के लिए “वेतन घटा पेंशन” का सिद्धांत लागू किया गया।
प्रतिवादी ने हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर करके इस विनियम को अधिकार क्षेत्र से बाहर (ultra vires) और असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी। हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार की, जिसके परिणामस्वरूप प्रतिवादी के वेतन से पेंशन की राशि काटने का सरकारी आदेश रद्द हो गया।
हाईकोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
Case Title : STATE OF UTTARAKHAND THR. CHIEF SECRETARY AND OTHERS VERSUS M.C. BHANDARI AND ANOTHER (with connected case)