सुप्रीम कोर्ट ने एक गैंगरेप केस में चार लोगों की रेप की सज़ा रद्द की। साथ ही इस मामले में पीड़ित महिला की अकेली गवाही पर शक ज़ाहिर किया।
जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील पर सुनवाई की। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अपील करने वालों को रेप करने और पीड़ित महिला को डराने-धमकाने के आरोप में दोषी ठहराया था।
साल 2000 में ट्रायल कोर्ट ने चारों आरोपियों को दोषी ठहराया और उन्हें 10 साल की कड़ी सज़ा के साथ-साथ जुर्माना भी लगाया। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 2012 में इस सज़ा को सही ठहराया।
सुप्रीम कोर्ट में अपील पर सुनवाई के दौरान, चार आरोपियों में से दो की मौत हो गई।
सरकारी वकील के मुताबिक, पीड़ित महिला ने 31 जुलाई 1998 को देहरादून के सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस को एक लिखित शिकायत दी थी। यह शिकायत 7 अप्रैल, 1998 को हुई एक घटना के बारे में थी। अपनी शिकायत में उसने बताया कि शाम करीब 7:30 बजे, जब वह संजय कॉलोनी में बाज़ार से घर लौट रही थी, तो चार लोगों - राजेंद्र, पप्पू उर्फ़ हनुमान, सुशील कुमार और किशन - ने उसे रोक लिया।
महिला ने आरोप लगाया कि आरोपियों ने उसके मुँह में कपड़ा ठूंस दिया और उसकी आँखों पर एक काला रुमाल बांध दिया। इसके बाद वे उसे ज़बरदस्ती पास के एक खाली प्लॉट में ले गए। वहां, उसने दावा किया कि उन लोगों ने एक-एक करके उसके साथ रेप किया।
उसने आगे बताया कि वह इस घटना की रिपोर्ट पहले इसलिए नहीं कर पाई, क्योंकि आरोपियों ने उसे धमकी दी थी कि अगर उसने किसी को भी इस बारे में बताया तो उसे गंभीर नतीजे भुगतने पड़ेंगे।
सज़ा के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में बचाव पक्ष ने यह दलील दी कि शिकायत करने वाली महिला ने कथित घटना के तीन महीने बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। उसने शर्म के मारे अपने परिवार के किसी भी सदस्य को इस बारे में नहीं बताया। इसके बजाय उसने दावा किया कि उसने यह बात एक अनजान महिला को बताई, जिसकी पहचान उसे खुद भी याद नहीं थी। इस वजह से बचाव पक्ष उस महिला को गवाह के तौर पर पेश करके उससे पूछताछ नहीं कर पाया।
इसके अलावा, अपील करने वालों ने यह भी बताया कि केस की सुनवाई के अलग-अलग चरणों में पीड़ित महिला के बयानों में कई विरोधाभास थे। उदाहरण के लिए, पीड़ित महिला ने एक बयान में कहा था कि यह घटना एक कमरे में हुई, जबकि दूसरे बयान में उसने दावा किया कि यह घटना एक खाली प्लॉट में हुई। घटनास्थल की जगह और आस-पास के दूसरे हालात के बारे में भी विरोधाभास थे।
बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि कथित घटना एक घनी आबादी वाले इलाके के पास हुई थी। फिर भी कोई भी स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया गया। उन्होंने आगे यह तर्क दिया कि दोनों पक्षों के बीच पानी की सप्लाई को लेकर हुए झगड़े की वजह से पहले से ही दुश्मनी थी, जिसकी वजह से उन्हें झूठे केस में फंसाया जा सकता था।
हाईकोर्ट के दोषी ठहराने का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस वराले द्वारा लिखे गए फैसले में पीड़िता का बर्ताव अस्वाभाविक पाया गया; उसने कथित घटना के बारे में अपने परिवार के किसी सदस्य को बताने के बजाय किसी अनजान बाहरी व्यक्ति को बताया था।
कोर्ट ने कहा,
“शिकायत में जैसा बताया गया, पीड़िता ने शर्म और नासमझी की वजह से इस घटना के बारे में किसी को नहीं बताया—न दोस्तों को, न परिवार को और न ही अपने पति को। पीड़िता का यह बयान किसी भी इंसान के स्वाभाविक बर्ताव के खिलाफ है। पीड़िता के लिए यह स्वाभाविक होता कि वह कुछ समय बाद इस घटना के बारे में अपने परिवार वालों को बताती, न कि किसी ऐसे व्यक्ति को जिसे वह जानती भी नहीं थी; इसलिए पीड़िता के इस बयान को मानना बहुत मुश्किल है।”
कोर्ट ने आगे कहा,
“कानून में यह एक स्थापित सिद्धांत है कि किसी को दोषी ठहराने का फैसला सिर्फ पीड़िता के अकेले बयान पर भी आधारित हो सकता है, बशर्ते वह बयान कोर्ट में विश्वास जगाता हो। इस मामले में पीड़िता का बयान इस कोर्ट में बिल्कुल भी विश्वास जगाने में नाकाम रहा है।”
कोर्ट ने यह भी बताया कि सहायक सबूतों की गैर-मौजूदगी में कोर्ट को पीड़िता की अकेली गवाही को मानना मुश्किल लगा, खासकर तब जब उसने कथित घटना के लगभग तीन महीने बाद शिकायत दर्ज करवाई थी।
कोर्ट ने विजयन बनाम केरल राज्य (2008) 14 SCC 763 पर भरोसा किया, जहां अभियोजन पक्ष का मामला पूरी तरह से पीड़िता की गवाही पर आधारित था, FIR दर्ज कराने में सात महीने की देरी हुई, और सहायक सबूतों की कमी के कारण अंततः आरोपी बरी हो गया।
कोर्ट ने विजयन (उपर्युक्त) में की गई टिप्पणी को उद्धृत किया,
“जिन मामलों में केवल पीड़िता की गवाही उपलब्ध होती है, वहां आरोपी को दोषी ठहराना बहुत खतरनाक होता है, खासकर तब जब पीड़िता बलात्कार की FIR दर्ज कराने के लिए सात महीने तक इंतज़ार कर सकती हो। इससे आरोपी पूरी तरह से बेसहारा हो जाता है। अगर पीड़िता ने घटना के तुरंत बाद शिकायत दर्ज कराई होती तो कुछ सहायक सबूत, जैसे मेडिकल रिपोर्ट या पीड़िता के शरीर पर कोई अन्य चोट, उपलब्ध होते, जो बलात्कार के संकेत दिखाते। अगर पीड़िता ने अपनी मर्ज़ी से यौन संबंध बनाए और FIR दर्ज कराने के लिए सात महीने तक इंतज़ार किया तो ऐसी अकेली मौखिक गवाही के आधार पर दोषी ठहराना बहुत जोखिम भरा होगा।”
कोर्ट ने फैसला सुनाया,
“यहां कोई मेडिकल सबूत, या रिकॉर्ड पर कोई अन्य सबूत नहीं है, जो यह साबित करे कि आरोपी व्यक्तियों ने यह गंभीर कृत्य किया। विजयन (उपर्युक्त) मामले का सिद्धांत इस मौजूदा मामले पर पूरी तरह से लागू होता है। इसलिए हमें यह मानने का कोई भी कारण नहीं मिलता कि अपीलकर्ताओं ने यह जघन्य कृत्य किया। रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री आरोपी व्यक्ति के अपराध को स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं करती है, और अभियोजन पक्ष ने अपने मामले को उचित संदेह से परे साबित नहीं किया। इसलिए हम इस अपील को स्वीकार करते हैं और हाईकोर्ट के फैसले और आदेश को रद्द करते हैं।”
तदनुसार, अपील स्वीकार की गई।
Cause Title: RAJENDRA & ORS VERSUS STATE OF UTTARAKHAND