सक्सेशन एक्ट में कोई समय-सीमा न बताए जाने के कारण प्रोबेट रद्द करने का मामला लिमिटेशन एक्ट के आर्टिकल 137 के तहत आएगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 में वसीयत के प्रोबेट के लिए या पहले से जारी प्रोबेट को रद्द करने की अर्ज़ी दाखिल करने के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई, इसलिए ऐसी कार्यवाही लिमिटेशन एक्ट, 1963 के आर्टिकल 137 के तहत आएगी। यह आर्टिकल उन अर्जियों के लिए तीन साल की समय-सीमा तय करता है, जिनके लिए कोई खास समय-सीमा नहीं बताई गई।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने धीरज दत्ता की अपील को मंज़ूरी देते हुए यह बात कही। उन्होंने माना कि 1995 में जारी प्रोबेट रद्द करने के लिए 2022 में दी गई अर्ज़ी समय-सीमा (लिमिटेशन) के कारण मान्य नहीं थी।
कोर्ट ने कहा,
"ISA में प्रोबेट जारी करने या उसे रद्द करने की अर्ज़ी देने के लिए कोई समय-सीमा नहीं दी गई, इसलिए लिमिटेशन एक्ट 1963 के आर्टिकल 137 का सहारा लेना होगा।"
मामले के तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि जिस पक्ष को प्रोबेट से जुड़ी म्यूटेशन कार्यवाही की जानकारी (कंस्ट्रक्टिव नोटिस) मानी जाती है, वह बाद में जानकारी न होने के आधार पर प्रोबेट को चुनौती नहीं दे सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद गौरीप्रोवा सेन को उनके पति से विरासत में मिली संपत्तियों से जुड़ा है। अक्टूबर 1989 में अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने 9 जुलाई 1989 को एक वसीयत बनाई, जिसमें अपने भतीजे धीरज दत्ता को एकमात्र निष्पादक (एक्ज़ीक्यूटर) और लाभार्थी नियुक्त किया। वसीयत का प्रोबेट सितंबर 1995 में जारी किया गया।
इसके बाद दत्ता ने रेवेन्यू रिकॉर्ड में म्यूटेशन की कार्यवाही शुरू की। उनके अनुसार, उस कार्यवाही में प्रतिवादियों के पूर्ववर्तियों (predecessors-in-interest) को 2013 में नोटिस भेजे गए। हालांकि, प्रतिवादियों का दावा था कि उन्हें प्रोबेट के बारे में 2019 में पता चला और उसके बाद उन्होंने संपत्ति से जुड़ा मुकदमा दायर किया। 2022 में उन्होंने इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 की धारा 263 के तहत प्रोबेट रद्द करने की अर्ज़ी दी।
जहां एक सिंगल जज ने समय-सीमा खत्म होने (टाइम-बार्ड) के आधार पर रद्द करने की अर्ज़ी को खारिज किया था, वहीं डिवीज़न बेंच ने अलग राय रखी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। डिविजन बेंच का फ़ैसला रद्द करते हुए जस्टिस करोल के फ़ैसले में पाया गया कि प्रोबेट रद्द करने की रेस्पॉन्डेंट की अर्ज़ी समय-सीमा (लिमिटेशन) के कारण मान्य नहीं थी। कोर्ट ने रेस्पॉन्डेंट की इस बात पर सवाल उठाया कि उन्हें कई सालों तक इस बारे में जानकारी नहीं थी, जबकि उन्हें अपीलकर्ता द्वारा प्रोबेट मिलने के बाद म्यूटेशन की कार्यवाही शुरू करने के बारे में कंस्ट्रक्टिव नोटिस (कानूनी रूप से मानी गई जानकारी) मिल चुका था। कोर्ट ने कहा कि रेस्पॉन्डेंट से यह उम्मीद की जाती थी कि वे कम से कम यह पता लगाते कि उन्हें नोटिस क्यों भेजा गया और इस मामले में उन्हें क्या करना है।
कोर्ट ने कहा,
"अगर किसी कोर्ट ने किसी को नोटिस भेजा है तो कम-से-कम यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वे यह पता लगाने की कोशिश करें कि उन्हें नोटिस क्यों भेजा गया है और उन्हें इस संबंध में क्या करना होगा।"
कोर्ट रेस्पॉन्डेंट की इस दलील से सहमत नहीं था कि प्रोबेट रद्द करने की अर्ज़ी दाखिल करने के लिए तीन साल की समय-सीमा की गिनती 2019 से होनी चाहिए। इसके बजाय, कोर्ट अपीलकर्ता की इस बात से सहमत था कि म्यूटेशन की कार्यवाही शुरू होने के बारे में 2011 में मिला नोटिस ही समय-सीमा की गिनती का शुरुआती बिंदु था। इसलिए कोर्ट ने माना कि 2022 में प्रोबेट रद्द करने के लिए दाखिल की गई अर्ज़ी समय-सीमा के दायरे से बाहर (टाइम-बार्ड) थी।
कोर्ट ने कहा,
"...म्यूटेशन की कार्यवाही में मिले नोटिस को कंस्ट्रक्टिव नोटिस माना जाएगा। यह पता लगाने की कोशिश की जानी चाहिए कि म्यूटेशन की कार्यवाही किस आधार पर शुरू की गई और आर्टिकल 137 के तहत समय-सीमा उस दिन से लागू होती जब उन्हें पता चलता कि उक्त कार्यवाही अपीलकर्ता को दी गई वसीयत के प्रोबेट पर आधारित थी। किसी भी हाल में 2022 में तय समय-सीमा के दायरे में आने के लिए यह 2019 नहीं हो सकता। प्रोबेट रद्द करने के लिए रेस्पॉन्डेंट की अर्ज़ी निश्चित रूप से समय-सीमा के दायरे से बाहर होगी।"
नतीजतन, अपील मंज़ूर की गई और सिंगल जज का फ़ैसला बहाल किया।
Cause Title: DHIRAJ DUTTA VERSUS ANIRBAN SEN & ORS.