सबरीमला रेफरेंस: 'एसेन्शियल रिलिजियस प्रैक्टिस' टेस्ट खतरनाक, बोनाफाइड विश्वास ही सही कसौटी—राजीव धवन

Update: 2026-04-19 19:15 GMT

सबरीमला रेफरेंस की सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट राजीव धवन ने तर्क दिया कि “एसेन्शियल रिलिजियस प्रैक्टिस” (Essential Religious Practice) का सिद्धांत खतरनाक है, क्योंकि इससे अदालतों को यह तय करना पड़ता है कि कोई धार्मिक प्रथा आवश्यक है या नहीं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि वे धार्मिक स्वतंत्रता की न्यायिक समीक्षा के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उनके अनुसार अनुच्छेद 25 और 26 के तहत सही कसौटी यह होनी चाहिए कि किसी विश्वास की बोनाफाइड (ईमानदारी से मानी गई) प्रकृति क्या है, न कि वह “आवश्यक” है या नहीं।

धवन ने Bijoe Emmanuel v. State of Kerala मामले का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने यहोवा विटनेस समुदाय के बच्चों को राष्ट्रगान न गाने के बावजूद संरक्षण दिया था।

नौ-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष बहस

यह दलील सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की पीठ के सामने दी गई, जो सबरीमला मामले से जुड़े व्यापक संवैधानिक सवालों पर सुनवाई कर रही है। धवन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह निष्कर्ष गलत था कि मासिक धर्म वाली महिलाओं के प्रवेश पर रोक “आवश्यक धार्मिक प्रथा” नहीं है।

उन्होंने कहा कि जस्टिस इंदु मल्होत्रा (एकमात्र असहमति) का दृष्टिकोण सही था, जिसमें “वास्तविक और ईमानदारी से माने गए विश्वास” की जांच को प्राथमिकता दी गई थी।

अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या

धवन ने कहा कि अनुच्छेद 25(1) के तहत अंतरात्मा की स्वतंत्रता (freedom of conscience) बहुत व्यापक है। वहीं अनुच्छेद 25(2) के शब्द “nothing in this article” यह सुनिश्चित करते हैं कि व्यक्तिगत धार्मिक अधिकार सामाजिक सुधारों में बाधा न बनें।

अनुच्छेद 26 को उन्होंने धार्मिक संस्थाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण अधिकार बताते हुए कहा कि इसके बिना कोई भी धर्म जीवित नहीं रह सकता, क्योंकि यह संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता देता है।

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अनुच्छेद 26 को पूरी तरह अनुच्छेद 25 के अधीन नहीं माना जा सकता, बल्कि दोनों के बीच संतुलन (proportionality) के सिद्धांत से व्याख्या की जानी चाहिए।

सबरीमला फैसले की आलोचना

धवन ने सबरीमला फैसले की उस व्याख्या की आलोचना की, जिसमें “धार्मिक संप्रदाय” (religious denomination) के लिए एक अतिरिक्त शर्त—“exclusive distinctiveness”—जोड़ दी गई थी। उन्होंने कहा कि यह एक गलती थी और इस पहलू को पलटा जाना चाहिए।

अंधविश्वास पर भी दिया तर्क

धवन ने कहा कि अंधविश्वास (superstitious belief) को भी संरक्षित किया जाना चाहिए, क्योंकि यदि हर धार्मिक विश्वास को वैज्ञानिक कसौटी पर कसा जाए तो अधिकांश धर्म समाप्त हो जाएंगे। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि अंधविश्वास की बाहरी अभिव्यक्तियां, जैसे जादू-टोना, संरक्षण योग्य नहीं हैं।

नैतिकता और न्यायिक समीक्षा

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 25 और 26 में “morality” का अर्थ “संवैधानिक नैतिकता” (constitutional morality) के रूप में सीमित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसे समाज के व्यापक नैतिक मूल्यों के रूप में समझा जाना चाहिए।

लॉकस स्टैंडी (Locus) पर टिप्पणी

धवन ने कहा कि किसी अन्य धर्म का व्यक्ति सामान्यतः दूसरे धर्म की प्रथाओं को चुनौती नहीं दे सकता, जब तक कि वह दावा स्पष्ट रूप से गलत न हो। हालांकि, यदि किसी के मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहे हों, तो वह हस्तक्षेप कर सकता है।

इस पर जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने सवाल उठाया कि क्या कोई गैर-विश्वासी किसी धार्मिक प्रथा की तर्कसंगतता पर सवाल उठा सकता है। धवन ने जवाब दिया कि कारण (cause of action) आमतौर पर विश्वासी के पास होगा, लेकिन कुछ परिस्थितियों में अन्य लोग भी याचिका दायर कर सकते हैं।

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