न्यायिक स्वतंत्रता का मतलब AI के अनुचित प्रभाव से भी आज़ादी: जस्टिस बीवी नागरत्ना

Update: 2026-04-19 09:30 GMT

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस नागरत्ना ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव को लेकर चेतावनी देते हुए कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता की पारंपरिक अवधारणा को अब बदलते समय के अनुसार विकसित करना होगा। उन्होंने कहा कि एआई पर अत्यधिक निर्भरता न्यायाधीशों की सोच और निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है और उनकी मानसिक स्वतंत्रता (cognitive autonomy) के लिए खतरा बन सकती है।

बेंगलुरु में आयोजित न्यायिक अधिकारियों के सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता अब केवल बाहरी दबावों से मुक्त होने तक सीमित नहीं है, बल्कि एल्गोरिदमिक प्रभाव से स्वतंत्रता भी उतनी ही जरूरी है। उन्होंने जोर दिया कि एआई का उपयोग केवल सहायक उपकरण के रूप में होना चाहिए और अंतिम निर्णय हमेशा न्यायाधीश के हाथ में ही रहना चाहिए।

फर्जी एआई जनरेटेड फैसलों पर चिंता

जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर भी चिंता जताई कि वकील अब एआई द्वारा बनाए गए फर्जी या अस्तित्वहीन फैसलों का हवाला दे रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि वकीलों को यह प्रमाणपत्र देना चाहिए कि जिन निर्णयों का वे हवाला दे रहे हैं, वे वास्तविक और प्रमाणित हैं।

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि उनके सामने एक मामले में “Mercy vs. Mankind” नाम का एक ऐसा फैसला उद्धृत किया गया, जो अस्तित्व में ही नहीं था। एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का गलत उद्धरण पेश किया गया।

डेटा सुरक्षा और गोपनीयता पर खतरा

उन्होंने कहा कि अदालतें अत्यंत संवेदनशील जानकारी से जुड़ी होती हैं—जैसे व्यक्तिगत विवाद, वित्तीय विवरण और आपराधिक रिकॉर्ड। ऐसे में एआई के उपयोग से डेटा लीक, दुरुपयोग या अनधिकृत पहुंच का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए मजबूत सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं ताकि पक्षकारों की गोपनीयता और गरिमा सुरक्षित रह सके।

न्याय में मानवीय तत्व जरूरी

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि न्याय केवल कानून लागू करने का काम नहीं है, बल्कि इसमें संवेदनशीलता, सहानुभूति और मानवीय समझ भी शामिल होती है, जिसे कोई मशीन पूरी तरह से नहीं समझ सकती।

उन्होंने चेतावनी दी कि अगर तकनीक का प्रभाव ज्यादा बढ़ गया, तो न्याय प्रक्रिया “मशीनी” हो सकती है और उसमें मानवीय संवेदनशीलता खत्म हो सकती है।

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