बिना भर्ती विज्ञापन या इंटरव्यू के नियुक्त एड-हॉक कर्मचारियों को पक्का नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला आंशिक रूप से रद्द किया। इस फैसले में हरियाणा सरकार की उन नीतियों के एक समूह को रद्द कर दिया गया था, जिनका मकसद कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले एड-हॉक और दिहाड़ी मज़दूरी वाले कर्मचारियों को पक्का करना था। कोर्ट ने 16 जून, 2014 और 18 जून, 2014 को जारी दो नोटिफिकेशन की वैधता को बरकरार रखा, लेकिन 7 जुलाई, 2014 को जारी दो नोटिफिकेशन रद्द किए।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने पाया कि जुलाई 2014 के नोटिफिकेशन उन एड-हॉक कर्मचारियों को पक्का करने की कोशिश कर रहे थे, जिनकी नियुक्ति किसी सार्वजनिक विज्ञापन के ज़रिए शुरू की गई उचित भर्ती प्रक्रिया के तहत नहीं हुई। इस तरह ये नोटिफिकेशन 'सेक्रेटरी, स्टेट ऑफ़ कर्नाटक बनाम उमादेवी (2006)' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहे थे।
उमादेवी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकारी नौकरियों में भर्ती आम तौर पर उचित भर्ती प्रक्रिया के ज़रिए ही होनी चाहिए, और कॉन्ट्रैक्ट पर या एड-हॉक काम करने वाले कर्मचारियों को अपने आप ही पक्का नहीं किया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने एक सीमित "एक-बारगी उपाय" के तौर पर उन कर्मचारियों को पक्का करने की अनुमति दी, जिन्होंने 10 अप्रैल, 2006 तक बिना किसी कोर्ट सुरक्षा के दस साल से ज़्यादा समय तक काम किया।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"इसका मकसद उन एड-हॉक कर्मचारियों को समायोजित करना था, जिन्हें किसी सार्वजनिक विज्ञापन या इंटरव्यू के अभाव में भले ही अस्थायी तौर पर काम पर रखा गया। हमें 07.07.2014 के दो नोटिफिकेशन की वैधता को बरकरार रखने का कोई उचित कारण नज़र नहीं आता, क्योंकि इनका मकसद उन एड-हॉक कर्मचारियों की सेवाओं को पक्का करना है, जिन्हें बिना किसी विज्ञापन और बिना इंटरव्यू के काम पर रखा गया। इस हद तक हाईकोर्ट का वह फैसला, जिसमें 07.07.2014 के नोटिफिकेशन को मनमाना और गैर-कानूनी बताया गया, उसमें दखल देने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
इन दो नीतियों को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जो कर्मचारी 7 जुलाई, 2014 की नीतियों के तहत पहले से ही सेवा में बने हुए हैं, उन्हें हटाया नहीं जाएगा। इसके बजाय, उन्हें उनके मौजूदा पदों के सबसे निचले वेतनमान पर रखा जाएगा। कोर्ट ने राय दी कि हाईकोर्ट ने जून 2014 की उन नोटिफिकेशन्स को अमान्य ठहराने में गलती की, जो 1996 की पिछली रेगुलराइज़ेशन पॉलिसी का फ़ायदा उन कर्मचारियों तक पहुंचाने के लिए जारी की गईं, जो पहले छूट गए।
इन नोटिफिकेशन्स के तहत कर्मचारियों के लिए यह ज़रूरी था कि उनकी नियुक्ति मंज़ूरशुदा पदों के ख़िलाफ़ हुई हो, उनके पास तय योग्यताएं हों और वे आरक्षण की शर्तों को पूरा करते हों। इसलिए कोर्ट ने कहा कि इन नोटिफिकेशन्स से नियमित भर्ती पर लागू होने वाले मानकों में कोई ढील नहीं दी गई।
हाईकोर्ट में दायर रिट याचिकाओं के समूह में हरियाणा सरकार की 16 जून 2014, 18 जून 2014 और 7 जुलाई 2014 की नोटिफिकेशन्स को चुनौती दी गई। इन नोटिफिकेशन्स के ज़रिए कॉन्ट्रैक्ट या एड-हॉक आधार पर काम कर रहे ग्रुप B, C और D के कर्मचारियों को नियमित करने की कोशिश की गई।
31 मई, 2018 को हाईकोर्ट ने इन पॉलिसियों को रद्द किया। कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि ये पॉलिसियां 'सेक्रेटरी, स्टेट ऑफ़ कर्नाटक बनाम उमादेवी' मामले में तय किए गए क़ानून के विपरीत हैं। साथ ही कोर्ट ने इन पॉलिसियों के तहत दिए गए फ़ायदों को वापस लेने का निर्देश दिया, लेकिन कर्मचारियों को छह महीने तक काम जारी रखने की अनुमति दी, ताकि इस दौरान नई भर्ती की जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के सामने हरियाणा राज्य और प्रभावित कर्मचारियों ने यह तर्क दिया कि ये पॉलिसियां संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत कार्यपालिका की शक्ति का वैध इस्तेमाल थीं, जिन्हें कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए अपनाया गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ये कर्मचारी योग्य थे, उनकी नियुक्ति सार्वजनिक विज्ञापनों और चयन समितियों के माध्यम से हुई और उनकी नियुक्ति केवल 'अनियमित' थी, न कि 'अवैध'।
कोर्ट ने जून, 2014 की नोटिफिकेशन्स की जांच की और पाया कि इनका उद्देश्य उन कर्मचारियों को नियमित करना था, जो 1996 की पिछली पॉलिसी के तहत योग्य थे, लेकिन छूट गए। कोर्ट ने यह भी पाया कि रेगुलराइज़ेशन के लिए तय किए गए मापदंड भर्ती के नियमों के अनुरूप थे; इनमें मंज़ूरशुदा पदों के ख़िलाफ़ काम करने और ज़रूरी योग्यताएं रखने की शर्त भी शामिल थी। कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि अयोग्य लोगों को नियमित किया जा रहा था, या यह प्रक्रिया मनमानी या दुर्भावनापूर्ण थी।
इसके विपरीत, कोर्ट ने माना कि 7 जुलाई, 2014 की अधिसूचनाएं मनमानी और गैर-कानूनी थीं। कोर्ट ने कहा कि इन नीतियों का मकसद उन कर्मचारियों को नियमित करना था, जिनकी नियुक्ति किसी विज्ञापन या इंटरव्यू के ज़रिए नहीं हुई। साथ ही इन नीतियों ने उन कर्मचारियों को भी योग्य बना दिया, जो 31 दिसंबर, 2018 तक ही अपनी सेवा के दस साल पूरे करने वाले थे। कोर्ट ने कहा कि ऐसी नीति का कोई औचित्य नहीं था और यह ऐसे कर्मचारियों के लिए पद आरक्षित करके नियमित भर्ती को रोक देगी।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“हरियाणा राज्य ने रिकॉर्ड पर ऐसा कोई औचित्य पेश नहीं किया कि ऐसे तदर्थ (Ad Hoc) कर्मचारियों की सेवाएं क्यों नियमित करने की कोशिश की गई, जिन्हें किसी विज्ञापन या इंटरव्यू के आधार पर नियुक्त नहीं किया गया—और वह भी 31.12.2018 की भविष्य की कट-ऑफ तारीख को ध्यान में रखते हुए। बिना किसी विज्ञापन के नियुक्त होने का दावा ही नियुक्ति के तरीके को लेकर संदेह पैदा करता है। नियुक्ति के तरीके का कोई भी रिकॉर्ड न होना, इस प्रक्रिया में कोई भरोसा पैदा नहीं करता। यह तथ्य कि ऐसे तदर्थ कर्मचारी ने किसी इंटरव्यू का सामना नहीं किया, एक और प्रासंगिक पहलू है। इसके अलावा, भविष्य की कट-ऑफ तारीख तय करने का कोई तार्किक आधार भी नज़र नहीं आता, जो अधिसूचनाओं की तारीख से चार साल आगे की है। इससे यह संकेत मिलता है कि जब 07.07.2014 की अधिसूचनाएं जारी होने के बाद नियमित भर्ती की प्रक्रिया शुरू करना संभव था, तब भी इन विवादित अधिसूचनाओं के चलते नियमित भर्ती के ज़रिए भरे जा सकने वाले कई पदों के लिए विज्ञापन जारी नहीं किए गए।”
7 जुलाई, 2014 की अधिसूचनाओं को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि कई कर्मचारी अंतरिम आदेशों के तहत वर्षों तक सेवा में बने रहे थे और राज्य ने खुद कहा कि उनकी सेवा जारी रहने से विज्ञापित पदों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि ऐसे कर्मचारियों को सेवा से न हटाया जाए और उन्हें 'समान काम के लिए समान वेतन' के सिद्धांत के अनुरूप, उनके पदों पर लागू सबसे निचले वेतनमान पर रखा जाए।
तदनुसार, कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में संशोधन किया। कोर्ट ने 16 जून और 18 जून, 2014 की अधिसूचनाओं को सही ठहराया और उनके तहत दिए गए लाभों को—सत्यापन की शर्त के साथ—बहाल किया। इसने 7 जुलाई, 2014 की अधिसूचनाओं को रद्द किया, लेकिन उनके तहत पहले से ही कार्यरत कर्मचारियों को संरक्षण प्रदान किया।
Case Title – Madan Singh and Ors. v. State of Haryana and Ors.