'राजस्व रिकॉर्ड से मालिकाना हक साबित नहीं होता': सुप्रीम कोर्ट ने भूमि स्वामित्व पर कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किए

Update: 2026-05-07 11:47 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (6 मई) को कहा कि राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Entries) केवल कब्जे का प्रमाण हो सकते हैं, लेकिन वैध स्वामित्व दस्तावेजों के अभाव में उन्हें जमीन के मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि केवल जमाबंदी, पहानी या अन्य राजस्व प्रविष्टियों के आधार पर भूमि पर मालिकाना दावा नहीं किया जा सकता, जब तक कि प्राथमिक शीर्षक दस्तावेज (Title Documents) पेश न किए जाएं।

मामला तेलंगाना के कलवलानगरम गांव की लगभग 600 एकड़ जमीन से जुड़ा था, जिसे 1950 की अधिसूचना के तहत आरक्षित वन क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव था। अपीलकर्ताओं ने दावा किया कि निजाम शासन के दौरान 1931-32 में उन्हें पट्टे दिए गए थे और उन्होंने अपने दावे के समर्थन में विभिन्न राजस्व रिकॉर्ड पेश किए।

हालांकि, 2003 में जॉइंट कलेक्टर ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि कोई मूल पट्टा या शीर्षक दस्तावेज पेश नहीं किया गया और केवल राजस्व प्रविष्टियों से स्वामित्व साबित नहीं होता। बाद में हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने अपीलकर्ताओं को राहत दी, लेकिन डिवीजन बेंच ने फैसला पलट दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्व रिकॉर्ड का उद्देश्य केवल राजस्व वसूली है, यह मालिकाना हक प्रदान नहीं करते। कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार में संपत्ति के जटिल स्वामित्व विवादों का फैसला नहीं किया जा सकता और ऐसे मामलों का उचित मंच सिविल कोर्ट है।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी।

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