पाचन प्रक्रिया के आधार पर लगाए गए अनुमान, हत्या के समय के बारे में विश्वसनीय चश्मदीदों के बयानों को गलत साबित नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने 2001 में कर्नाटक में दो भाइयों की हत्या के मामले में सात लोगों की दोषसिद्धि बरकरार रखी। कोर्ट ने कहा कि मृतकों की पत्नियों के भरोसेमंद चश्मदीद बयानों को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे पीड़ितों के रिश्तेदार थीं।
कोर्ट ने दोहराया कि प्रत्यक्ष चश्मदीद गवाही की विश्वसनीयता, मेडिकल अनुमानों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने दोषियों की अपील खारिज की। इसके साथ ही कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें सेशन कोर्ट द्वारा दोषियों को बरी किए जाने के आदेश को पलट दिया गया था।
यह मामला 2001 का है, जब दोषियों ने रात के समय मृतकों पर कुल्हाड़ी से हमला किया, जिससे उनकी मौत हो गई। इस पूरी घटना को मृतकों की पत्नियों ने अपनी आंखों से देखा था, और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पुष्टि हुई कि यह एक हत्या का मामला था। इसके अलावा, आरोपियों के बयानों के आधार पर वह कुल्हाड़ी भी बरामद की गई, जिसका इस्तेमाल अपराध करने में किया गया।
हालांकि, सेशन कोर्ट ने प्रत्यक्ष चश्मदीद गवाहों के बयानों को नजरअंदाज किया और ऐसे मामूली सबूतों पर भरोसा किया, जिनका मामले के नतीजे पर कोई असर नहीं पड़ता। सेशन कोर्ट ने प्रत्यक्ष सबूतों की विश्वसनीयता को कम करने के लिए मेडिकल साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के बीच के अंतर को आधार बनाया। इसमें मृतकों की पाचन प्रक्रिया के जरिए उनके आखिरी भोजन और मौत के समय के बीच के अंतर का अनुमान लगाया गया।
पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने बताया कि दोनों मृतकों की मौत के समय में लगभग चार घंटे का अंतर था, जबकि गवाहों ने बताया कि उनकी मौत आखिरी बार खाना खाने के लगभग चार घंटे बाद हुई।
हाईकोर्ट ने आरोपियों को बरी करने वाले सेशन कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि सेशन कोर्ट ने सबूतों को सही ढंग से नहीं समझा और उसका तर्क गलत था।
हाईकोर्ट ने कहा,
"ट्रायल जज का निष्कर्ष तर्कसंगत नहीं लगता। यह कैसे संभव है कि मल्लप्पा की हत्या करने के बाद आरोपी चार घंटे तक इंतजार करे और फिर गुल्लप्पा की हत्या कर दे? दोनों घटनाएं मृतक के घर के पास ही हुई हैं। ट्रायल जज ने इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि दोनों हत्याओं के बीच 4 घंटे का अंतर कैसे हो सकता है।"
जस्टिस विश्वनाथन द्वारा लिखे गए फैसले में हाईकोर्ट के निष्कर्षों का समर्थन करते हुए कहा गया कि अपीलकर्ताओं ने पाचन प्रक्रिया (Digestive Process) के अनिश्चित आधार पर अभियोजन पक्ष के मामले पर संदेह पैदा करने की कोशिश की। लेकिन, जब घटना का प्रत्यक्ष चश्मदीद गवाह मौजूद हो, तो ऐसी दलीलों का कोई महत्व नहीं रह जाता।
कोर्ट ने कहा,
"अपीलकर्ताओं के वरिष्ठ वकील ने पाचन प्रक्रिया के अनिश्चित आधार का सहारा लेकर अभियोजन पक्ष के मामले पर संदेह पैदा करने की कोशिश की। तथ्यों के लिहाज से देखा जाए तो यह दलील अपने आप में ही बहुत अजीब है और इसे स्वीकार करना मुश्किल है।"
कोर्ट ने जोर देकर कहा,
"जब रिकॉर्ड पर ऐसे विश्वसनीय चश्मदीद गवाह मौजूद हों जो घटना के समय के बारे में स्पष्ट रूप से बता रहे हों तो केवल पाचन प्रक्रिया के अनुमानों के आधार पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। किसी भी स्थिति में, केवल इसी आधार पर मौखिक गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"चश्मदीदों के बयानों से साफ पता चलता है कि यह घटना 08.09.2001 और 09.09.2001 की दरमियानी रात को लगभग 1:00 बजे हुई थी। सबूतों से यह भी स्पष्ट है कि रात करीब 10:00 बजे खाना तैयार किया गया और उसके बाद भोजन किया गया। ये दोनों घटनाएं एक के बाद एक बहुत कम समय के अंतराल पर हुईं। ट्रायल कोर्ट ने पूरी तरह से डॉक्टर (PW-19) द्वारा अदालत के एक सवाल के जवाब पर भरोसा किया और पाचन प्रक्रिया के अनुमान के आधार पर इस घटना को ही मानने से इनकार किया।
जब रिकॉर्ड पर ऐसे विश्वसनीय चश्मदीद गवाह मौजूद हों, जो घटना के समय के बारे में स्पष्ट रूप से बता रहे हों तो केवल पाचन प्रक्रिया के अनुमानों के आधार पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। किसी भी स्थिति में, केवल इसी आधार पर मौखिक गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।"
इन्क्वेस्ट रिपोर्ट में नाम न होने के आधार पर चश्मदीद गवाह की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस तर्क को भी खारिज किया, जिसमें कहा गया कि इन्क्वेस्ट पंचनामा (Inquest Panchnama) में चश्मदीद गवाहों के नाम नहीं थे।
कोर्ट ने 'कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर' की धारा 174 (जो अब 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023' की धारा 194 है) का हवाला देते हुए दोहराया कि इन्क्वेस्ट (Inquest) का उद्देश्य केवल मौत के स्पष्ट कारण का पता लगाना है, और यह देखना है कि क्या मौत अप्राकृतिक या संदिग्ध थी।
कोर्ट ने 'राधा मोहन सिंह उर्फ लाल साहेब बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में अपने पुराने फैसले का सहारा लिया। उस फैसले में बताया गया कि इन्क्वेस्ट रिपोर्ट में हमले की असल घटना, हमलावरों की पहचान और चश्मदीद गवाहों के नामों का विवरण दर्ज करना जरूरी नहीं है।
बेंच ने कहा:
"किसी चश्मदीद गवाह की गवाही को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि इन्क्वेस्ट रिपोर्ट में उनका नाम नहीं था।"
कोर्ट ने आगे कहा कि इन्क्वेस्ट रिपोर्ट में चश्मदीद गवाहों के नाम न होना, अभियोजन पक्ष (Prosecution) के मामले को कमजोर करने के लिए काफी नहीं है।
परिणामस्वरूप, अपील विफल रही और उसे खारिज किया गया। अपीलकर्ताओं को तुरंत सरेंडर करने का निर्देश दिया गया।
Case Title : SHEKAPPA & ORS. VERSUS STATE OF KARNATAKA