सुप्रीम कोर्ट ने ₹2500 की बिलिंग गलती को लेकर अस्पताल के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला रद्द किया
सुप्रीम कोर्ट ने नारायण हेल्थ, कोलकाता में उसके अस्पताल और सीनियर अधिकारियों के खिलाफ ₹2,500 की बिलिंग में गड़बड़ी के आरोपों को लेकर शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने माना कि शिकायत में कोई आपराधिक अपराध सामने नहीं आया और यह मूल रूप से सेवा से जुड़ी एक शिकायत थी, जिसका समाधान दीवानी या वैधानिक उपायों के ज़रिए बेहतर ढंग से किया जा सकता था।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह फैसला सुनाया। खंडपीठ ने अस्पताल और उसके कर्मचारियों की अपील स्वीकार की, जो कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर की गई। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में मजिस्ट्रेट के समन आदेश को तो रद्द कर दिया था, लेकिन मामले को दोबारा विचार के लिए वापस भेज दिया ताकि अस्पताल चलाने वाली संस्था (अपीलकर्ता नंबर 1) और उसके चेयरमैन की संलिप्तता की जांच की जा सके।
संक्षेप में मामला
यह मामला फरवरी 2021 में नारायण हेल्थ अस्पताल (अपीलकर्ता नंबर 1), बारासात में शिकायतकर्ता (प्रतिवादी नंबर 2) की मां के इलाज के बाद दायर की गई शिकायत से जुड़ा है। मां के डिस्चार्ज होने के बाद शिकायतकर्ता ने अस्पताल से संपर्क किया और बिलिंग में कुछ गड़बड़ियों की ओर इशारा करते हुए मेडिकल दस्तावेज़/रिकॉर्ड मांगे। इसके बाद अस्पताल ने एक संशोधित बिल जारी किया, जिसमें एक टेस्ट के शुल्क में ₹2,500 का समायोजन (Adjustment) दिखाया गया।
वह टेस्ट कराने का प्रस्ताव था, लेकिन अंततः वह टेस्ट नहीं किया गया। इसलिए संशोधित बिल में यह दिखाया गया कि ₹2,500 की राशि शिकायतकर्ता को वापस की जानी है और अस्पताल ने शिकायतकर्ता से संपर्क करके उसे यह राशि वापस ले जाने के लिए कहा। हालांकि, शिकायतकर्ता ने एक मामला दर्ज किया, जिसमें उसने गलत बिलिंग, मेडिकल दस्तावेज़ समय पर उपलब्ध न कराने और प्रासंगिक जानकारी मांगने पर अस्पताल के कर्मचारियों द्वारा अनुचित व्यवहार/धमकियां देने की शिकायतें कीं।
इन आरोपों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 406, 420 और 120B के साथ-साथ 'पश्चिम बंगाल क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स (पंजीकरण, विनियमन और पारदर्शिता) अधिनियम, 2017' की धारा 34 के तहत अपराध दर्ज किए गए। मजिस्ट्रेट ने समन जारी किया, जिससे व्यथित होकर अपीलकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने अपने विवादित फैसले में समन आदेश को तो रद्द कर दिया, लेकिन मामले को दोबारा विचार के लिए वापस भेज दिया ताकि अलग-अलग क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्रों में आरोपियों की संलिप्तता की जांच की जा सके। इसके अलावा, कोर्ट ने अपने फैसले में यह टिप्पणी भी की थी कि प्रथम दृष्टया अपराध बनता है। जब अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में यह मामला दायर किया तो मजिस्ट्रेट के सामने आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी गई (नोटिस जारी करते समय)। संबंधित प्रावधानों का ध्यानपूर्वक विश्लेषण करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि शिकायत में लगाए गए आरोपों से पहली नज़र में कोई आपराधिक अपराध होता हुआ नहीं दिखता।
अदालत ने कहा,
“IPC की धारा 405 के तहत आपराधिक विश्वास भंग (Criminal Breach of Trust) के लिए संपत्ति का सौंपा जाना... बेईमानी से उसका दुरुपयोग... ज़रूरी है। संपत्ति न सौंपे जाने, बेईमानी से दुरुपयोग न होने, या किसी भरोसेमंद कर्तव्य (Fiduciary Obligation) का उल्लंघन न होने की स्थिति में IPC की धारा 405 में बताए गए आपराधिक विश्वास भंग के अपराध के मूल तत्व पूरे नहीं होते... जैसे ही शिकायतकर्ता ने गलत आरोप का मुद्दा उठाया, अस्पताल ने पैसे वापस करने का अपना फ़ैसला बता दिया। बिलिंग में जो गड़बड़ी दिख रही है, वह अस्पताल की तरफ़ से बेईमानी की नीयत से ज़्यादा एक अनजाने में हुई गलती लगती है। हमारी राय है कि धोखाधड़ी का आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद है।
चूंकि आपराधिक विश्वास भंग और धोखाधड़ी के अपराधों से जुड़े आरोप लगभग न के बराबर हैं, इसलिए आपराधिक साज़िश का उससे जुड़ा आरोप भी टिकने लायक नहीं है... शिकायत में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह पता चले कि आरोपियों के बीच कोई पहले से समझौता, मिलकर बनाई गई योजना, या किसी गैर-कानूनी काम को करने के लिए आपसी सहमति थी।"
अस्पताल के कर्मचारियों के अनुचित व्यवहार के आरोपों के संबंध में अदालत ने कहा कि शिकायत में केवल ऐसे बयानों का ज़िक्र था, जो शिकायतकर्ता को इस मामले को आगे बढ़ाने से हतोत्साहित करते थे। न तो शिकायत में, और न ही समन जारी करने के आदेश में IPC की धारा 503 के तहत किसी अपराध का ज़िक्र था। हाईकोर्ट ने अपनी तरफ़ से यह टिप्पणी की कि एक अपराध बनता है।
"हाईकोर्ट ने मामले को वापस भेजते समय अपनी तरफ़ से यह टिप्पणी की कि, 'दोनों आरोपियों का उपरोक्त कृत्य पहली नज़र में भारतीय दंड संहिता की धारा 504 के तहत अपराध बनाता है' और यह कि 'अपराध बनता है'। हमारी राय है कि हाईकोर्ट के लिए यह ज़रूरी नहीं था कि वह सामान्य आरोपों की व्याख्या करे और उन्हें धारा 504 के तहत अपराध के स्तर तक ले जाए। फिर यह टिप्पणी करे कि अपराध बनता है।"
यह निष्कर्ष निकाला गया कि आरोप, भले ही उन्हें पूरी तरह से सच मान लिया जाए और जैसा कहा गया वैसा ही स्वीकार कर लिया जाए। फिर भी उनसे यह ज़ाहिर नहीं होता कि संबंधित अपराध किए गए। जहां तक मेडिकल रिकॉर्ड की सप्लाई न करने या सप्लाई में देरी के आरोप का सवाल है, कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह आरोप किसी आपराधिक अपराध की श्रेणी में नहीं आता और ज़्यादा से ज़्यादा, यह सिविल कानून के तहत मुआवज़े के दावे का आधार बन सकता है।
2017 के एक्ट के प्रावधानों की जांच करते हुए यह माना गया कि विधायी योजना में विसंगतियों के लिए जुर्माने और घोषित अपराधों के लिए आपराधिक दायित्व के बीच अंतर किया गया। इसमें यह भी जोड़ा गया कि एक्ट में निहित योजना यह स्थापित करती है कि बिलिंग प्रथाओं, मेडिकल रिकॉर्ड की सप्लाई और सेवा-संबंधी शिकायतों से जुड़े विवादों को कमियों के रूप में माना जाना था, जिनके लिए मुआवज़ा देय था (यदि वे सच पाए जाते हैं)।
आगे कहा गया,
"यह बताए बिना कि आपराधिक अपराध कैसे और किस तरीके से किया गया, शिकायतकर्ता के लिए केवल शिकायत में धारा 34 का ज़िक्र करके मुकदमा आगे बढ़ाना स्वीकार्य नहीं है। हम इस तथ्य से इनकार नहीं करते कि शिकायतकर्ता की सेवा-संबंधी कुछ शिकायतें हो सकती हैं और इन्हें 2017 के एक्ट की धारा 29 के तहत हल किया जा सकता है।"
कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ताओं का मामला हाई कोर्ट के लिए CrPC की धारा 482 के तहत अपनी रद्द करने की शक्ति का प्रयोग करने के लिए एक उपयुक्त मामला था, लेकिन हाईकोर्ट ऐसा करने में विफल रहा। अपीलों को मंज़ूर करते हुए कोर्ट ने आगे कहा कि इस फैसले का किसी भी ऐसे वैधानिक या सिविल उपाय पर कोई असर नहीं पड़ेगा, जिसे शिकायतकर्ता अपनाना चाहे।
Case Title: NARAYANA HEALTH & ORS. VERSUS THE STATE OF WEST BENGAL & ORS., SLP (CRL.) NOS. 10379-10380 OF 2023