पीरियड लीव अनिवार्य करने से महिलाओं के रोजगार पर पड़ सकता है नकारात्मक प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-03-13 08:40 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सभी कार्यस्थलों में महिलाओं के लिए पेड मेंस्ट्रुअल लीव (मासिक धर्म अवकाश) की मांग करने वाली एक याचिका का निस्तारण करते हुए केंद्र सरकार से कहा कि वह याचिकाकर्ता की ओर से दिए गए प्रतिनिधित्व पर सभी हितधारकों से परामर्श करके नीति बनाने पर विचार करे।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी चिंता जताई कि यदि कानून बनाकर मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य कर दिया गया तो इसका महिलाओं के रोजगार पर उल्टा असर पड़ सकता है। कोर्ट ने कहा कि इससे नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से हिचक सकते हैं, जिससे कार्यबल में उनकी भागीदारी प्रभावित हो सकती है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता शैलेन्द्र मणी त्रिपाठी की लोकस स्टैंडी (याचिका दायर करने के अधिकार) पर भी सवाल उठाया और कहा कि इस मुद्दे पर स्वयं कोई महिला अदालत के सामने नहीं आई है।

यह इसी मुद्दे पर याचिकाकर्ता द्वारा दायर की गई तीसरी याचिका थी। पहली याचिका फरवरी 2023 में निस्तारित की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की अनुमति दी गई थी। इसके बाद 2024 में याचिकाकर्ता ने फिर अदालत का दरवाजा खटखटाया, यह कहते हुए कि मंत्रालय ने उसके प्रतिनिधित्व पर कोई जवाब नहीं दिया। उस याचिका का जुलाई 2024 में निस्तारण करते हुए अदालत ने केंद्र सरकार को नीति संबंधी निर्णय लेने को कहा था।

वर्तमान याचिका में याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश देने की मांग की थी कि वे महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं—जैसे डिसमेनोरिया, एंडोमेट्रियोसिस, यूटेराइन फाइब्रॉइड्स, एडेनोमायोसिस और पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज—को ध्यान में रखते हुए उचित राहत प्रदान करने के लिए कानून या नीतियां बनाएं। साथ ही कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए अवकाश की व्यवस्था करने की भी मांग की गई थी।

सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट एम.आर. शमशाद ने दलील दी कि फिलहाल केवल कर्नाटक सरकार ने मासिक धर्म अवकाश से संबंधित नीति बनाई है। इस पर कोर्ट ने कहा कि स्वेच्छा से ऐसी सुविधा देना अच्छी बात है, लेकिन यदि इसे कानून के जरिए अनिवार्य कर दिया गया तो इससे महिलाओं के करियर पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

चीफ़ जस्टिस ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि हर महीने छुट्टी का कानूनी अधिकार बना दिया गया तो निजी क्षेत्र में नियोक्ता महिलाओं को जिम्मेदार पद देने से भी हिचक सकते हैं। उन्होंने कहा कि इससे कार्यस्थलों पर महिलाओं को लेकर एक गलत धारणा भी बन सकती है।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए निर्देश दिया कि केंद्र सरकार याचिकाकर्ता के प्रतिनिधित्व पर विचार करे और सभी हितधारकों से परामर्श करके इस विषय पर उपयुक्त नीति बनाने की संभावना पर निर्णय ले।

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