परीक्षा में हाईकोर्ट विशेषज्ञों की राय की जगह अपना आकलन नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि अकादमिक मामलों में न्यायिक समीक्षा की शक्ति का इस्तेमाल विशेषज्ञों के निर्णय में हस्तक्षेप करने के लिए नहीं किया जा सकता।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग को परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं के दोबारा मूल्यांकन, कुछ प्रश्न हटाने और कुछ प्रश्नों पर पूर्ण अंक देने के निर्देश दिए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने Ran Vijay Singh v. State of Uttar Pradesh (2018) में तय सिद्धांतों के विपरीत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने अलग-अलग विषयों के विवादित प्रश्नों की इस तरह जांच की, जैसे वह खुद विशेषज्ञों से भी बड़ा विशेषज्ञ हो, और इस आधार पर दिए गए निर्देश टिकाऊ नहीं हैं।
पीठ ने दोहराया कि यदि परीक्षा के नियम पुनर्मूल्यांकन की अनुमति देते हैं तो संबंधित प्राधिकरण ऐसा कर सकता है। वहीं, जहां ऐसी व्यवस्था नहीं है, वहां अदालत केवल दुर्लभ और असाधारण मामलों में, स्पष्ट और ठोस गलती साबित होने पर ही पुनर्मूल्यांकन का निर्देश दे सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालतों को उत्तर पुस्तिकाओं या उत्तर कुंजी का खुद पुनर्मूल्यांकन नहीं करना चाहिए, क्योंकि अकादमिक मामलों का निर्णय विशेषज्ञों पर छोड़ना बेहतर है। संदेह की स्थिति में उत्तर कुंजी की शुद्धता मानते हुए उसका लाभ परीक्षा प्राधिकरण को दिया जाना चाहिए।
खंडपीठ ने कहा कि न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य निर्णय लेने की प्रक्रिया की वैधता जांचना है, न कि विशेषज्ञों के अकादमिक निर्णय का दोबारा मूल्यांकन करना। इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील मंजूर करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।