सुप्रीम कोर्ट ने शादी और बच्चों की कस्टडी से जुड़े झगड़ों में 'प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट, 2012' (POCSO Act) का हथियार के तौर पर गलत इस्तेमाल रोकने के लिए कुछ सुरक्षा उपाय तय किए। ये उपाय एक नाबालिग लड़की के पिता पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली FIR रद्द करते हुए तय किए गए, क्योंकि सेंट्रल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (CBI) की जांच में आरोप भरोसेमंद नहीं पाए गए।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच तलाकशुदा जोड़े - जिन्हें फैसले में 'R' (पिता) और 'E' (माता) कहा गया - के बीच अपनी नाबालिग बेटी 'M' की कस्टडी को लेकर चल रहे कड़वे और लंबे झगड़े से जुड़ी अपीलों पर सुनवाई कर रही थी।

कस्टडी के झगड़ों में POCSO Act के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए गाइडलाइंस

कोर्ट ने शादी से जुड़े झगड़ों में POCSO Act के बढ़ते गलत इस्तेमाल की ओर इशारा किया। गड्डम झांसी बनाम तेलंगाना राज्य, अचीन गुप्ता बनाम हरियाणा राज्य, ईश्वर चंद शर्मा बनाम यूपी राज्य और केरल हाईकोर्ट के सुहारा बनाम मुहम्मद जलील जैसे पुराने फैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने देखा कि जीवनसाथी कस्टडी के झगड़ों में फायदा उठाने या बेहतर समझौता करने के लिए झूठी POCSO शिकायतें दर्ज करा रहे हैं, जो एक चिंताजनक ट्रेंड है।

बेंच ने कहा कि हालांकि POCSO Act की धारा 22 झूठी शिकायतों के लिए सज़ा का प्रावधान करती है, लेकिन "जब तक धारा 22 लागू की जाती है, तब तक झूठा आरोप झेलने वाले पक्ष को काफी नुकसान हो चुका होता है," जैसे कि लंबे समय तक जेल में रहना या गार्डियनशिप या कस्टडी की चल रही कार्यवाही पर बुरा असर पड़ना। इसलिए कोर्ट ने कहा कि "आरोपी को ऐसे नुकसान से बचाने के लिए कानून के दायरे में कुछ सावधानियां बरती जानी चाहिए।"

बेंच ने आगे साफ किया,

"कुछ खास हालात और स्थितियों में आरोपी को होने वाले कभी न ठीक होने वाले नुकसान को रोकने के लिए हम जो भी सावधानी सोचें, वह एक्ट के मकसद के खिलाफ नहीं होनी चाहिए और न ही ऐसे अपराधों से निपटने की सख्ती को कम करने वाली होनी चाहिए। ज़रूरत एक संतुलन बनाने की है: ऐसी सावधानियां जो न तो एक्ट के मकसद को कमज़ोर करें और न ही इसके प्रावधानों को कमज़ोर करें, साथ ही यह भी पक्का करें कि आरोपी को कभी न ठीक होने वाला नुकसान न हो।"

सुरक्षा उपाय केवल माता-पिता या साथ रहने वाले परिवार के सदस्य से जुड़े वैवाहिक विवादों में लागू होते हैं

बेंच ने आगे स्पष्ट किया कि सुरक्षा उपाय केवल तभी लागू होंगे जब दो ज़रूरी शर्तें पूरी हों। पहली, POCSO Act के तहत अपराध का आरोप बच्चे (पीड़ित) के साथ एक ही घर में रहने वाले माता-पिता या परिवार के सदस्य पर लगाया गया हो। दूसरी, बच्चे (पीड़ित) के माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद हो, जिससे उनके रिश्तों में तनाव की संभावना का पता चले। इसने शिकायत लेने वाले पुलिस अधिकारी की यह ज़िम्मेदारी भी तय की कि शिकायत मिलने पर वह यह पुष्टि करे कि माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद है।

सिर्फ़ POCSO FIR दर्ज होने पर ही तुरंत गिरफ़्तारी नहीं होगी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब ज़रूरी शर्तें पूरी हों तो जांच अधिकारियों को POCSO FIR दर्ज होने के बाद जल्दबाज़ी में काम नहीं करना चाहिए या तुरंत गिरफ़्तारी नहीं करनी चाहिए।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 35 का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने ज़ोर दिया कि गिरफ़्तारी करने की शक्ति कानूनी रूप से मिली छूट (Discretion) है, न कि FIR दर्ज होने का अनिवार्य नतीजा। उस शक्ति का इस्तेमाल करने से पहले पुलिस को कानूनी शर्तों को पूरा करना होगा।

कोर्ट ने इस सिद्धांत को दोहराया कि गिरफ़्तारी की शक्ति का होना और उस शक्ति का इस्तेमाल करने का कारण दोनों अलग-अलग बातें हैं। सिर्फ़ इसलिए गिरफ़्तारी नहीं की जा सकती कि यह कानूनी रूप से संभव है।

जांच में मदद के लिए एक्सपर्ट चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट/साइकियाट्रिस्ट

जब ज़रूरी शर्तें पूरी हो जाती हैं तो कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी या स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट (SJPU) को जांच में मदद के लिए चाइल्ड एंड एडोलसेंट साइकियाट्री या क्लिनिकल साइकोलॉजी के एक्सपर्ट की सेवाएं लेनी चाहिए। यह फ़ैसला करने से पहले कि क्या आरोपी ने अपराध किया और क्या उसे गिरफ़्तार करने का कोई कारण है, ऐसा करना ज़रूरी है। ऐसा न करने की छूट केवल खास मामलों में ही दी जा सकती है, और इसके कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे।

हालांकि, बेंच ने एक्सपर्ट के मूल्यांकन पर दो महत्वपूर्ण सीमाएं स्पष्ट कीं। पहली, जांच अधिकारी या SJPU एक्सपर्ट रिपोर्ट के नतीजों या उसमें दी गई बातों को मानने के लिए बाध्य नहीं होंगे; रिपोर्ट केवल समझदारी से फ़ैसला लेने में मदद करने का एक ज़रिया है, न कि उस फ़ैसले को नियंत्रित करने का। दूसरी, चार्जशीट या क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल करने का एकमात्र आधार एक्सपर्ट रिपोर्ट नहीं होगी। इसका सीमित मकसद जांच एजेंसी को फ़ैसला लेने में मदद करना है।

POCSO स्पेशल कोर्ट में प्राइवेट शिकायतों के लिए सुरक्षा उपाय

POCSO Act की धारा 33 के तहत स्पेशल कोर्ट में सीधे दायर की गई शिकायतों के मामले में, बेंच ने कहा कि वही शर्तें लागू होंगी और स्पेशल कोर्ट को संज्ञान लेने और समन जारी करने का फैसला करने से पहले बाल और किशोर मनोरोग या क्लिनिकल साइकोलॉजी के किसी एक्सपर्ट को शामिल करना होगा। ऐसा केवल खास मामलों में ही किया जा सकता है, जिसके लिए लिखित में कारण दर्ज करने होंगे।

उन स्थितियों को देखते हुए जहां POCSO FIR का इस्तेमाल कस्टडी या गार्जियनशिप की समानांतर कार्यवाही में फायदा उठाने के लिए किया जा सकता है, कोर्ट ने कहा कि "POCSO Act के तहत मामला दर्ज होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकलना चाहिए कि आरोप सच है," और कोर्ट को स्वतंत्र रूप से यह तय करना चाहिए कि क्या आरोप बेबुनियाद हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि बेंच ने स्पष्ट किया कि ये सुरक्षा उपाय FIR-आधारित जांच पर लागू होंगे, जो फैसले की तारीख पर भी चल रही हैं, और धारा 33 के तहत उन प्राइवेट शिकायतों पर भी लागू होंगे जहां अभी तक समन जारी नहीं किए गए।

ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने सभी जिलों में डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट्स (DCPUs) को निर्देश दिया कि वे POCSO रूल्स, 2020 के नियम 5 के तहत अपने एक्सपर्ट रजिस्टरों को अपडेट करें और उनमें बाल और किशोर मनोरोग या क्लिनिकल साइकोलॉजी के एक्सपर्ट्स के नाम शामिल करें।

इसने यह भी निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में रिमांड और जमानत से निपटने वाली अदालतों को यह जांचना चाहिए कि जांच अधिकारी ने इन सुरक्षा उपायों का पालन किया है या नहीं। इसके साथ ही बेंच ने निर्देश दिया कि इस फैसले की एक कॉपी सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल्स और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को भेजी जाए ताकि सुरक्षा उपायों का प्रसार, प्रसारण और अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।

मामले के तथ्यों के संबंध में

दोनों पक्षों की शादी 2011 में हुई और 2015 में उनकी बेटी 'M' का जन्म हुआ। शादी टूटने के बाद, मां 2018 में बच्चे के साथ ससुराल से चली गई। इसके बाद कई वर्षों तक कानूनी लड़ाई (गार्जियनशिप याचिका) चली, और मां के खिलाफ FIR, तलाक की कार्यवाही और कस्टडी का मामला चला जो कर्नाटक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

मार्च 2022 में फैमिली कोर्ट ने मां को बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपने का निर्देश दिया। जनवरी 2023 में हाई कोर्ट ने इस फ़ैसले को बरकरार रखा, लेकिन माँ को बच्चे से मिलने का अधिकार (विज़िटेशन राइट्स) दिया। हाईकोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ माँ की स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) को सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2023 में खारिज किया। आख़िरकार, हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार जून 2023 में बच्चे की कस्टडी पिता को सौंप दी गई।

पिता ने विज़िटेशन राइट्स में बदलाव करने वाले हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इस बीच, माँ ने पिता के ख़िलाफ़ FIR दर्ज कराई और आरोप लगाया कि उन्होंने दो बार बच्चे का यौन उत्पीड़न किया और धमकी दी कि अगर बच्चे ने इस उत्पीड़न के बारे में बताया तो वे माँ को मार डालेंगे। FIR में POCSO Act की धारा 10, जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और सुरक्षा) एक्ट, 2015 (JJ Act) की धारा 75, और इंडियन पैनल कोड, 1860 (IPC) की धारा 323, 504 और 506 (जो अब क्रमशः भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115(2), 352 और 351 हैं) लगाई गईं।

आरोपों की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस साल अप्रैल में निर्देश दिया कि FIR की जांच CBI को सौंपी जाए। यह जांच एक महिला मनोवैज्ञानिक के साथ-साथ DIG (डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल) या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी की अध्यक्षता वाली एक कमेटी द्वारा की जानी थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच के दौरान CBI किसी भी पक्ष के ख़िलाफ़ कोई कठोर कार्रवाई नहीं करेगी।

CBI ने के शिवसुब्रमण्यम (DIG) की अध्यक्षता में कमेटी बनाई, जिसमें विनायक वर्मा (सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस, CBI/SP, CBI), शिल्पा (सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस, CBI/SP, CBI), डॉ. लक्ष्मी श्रवंती तनुकु (असिस्टेंट प्रोफेसर, चाइल्ड एंड एडोलसेंट साइकियाट्री, NIMHANS) और डॉ. अनामिका साहू (असिस्टेंट प्रोफेसर, क्लिनिकल साइकोलॉजी, NIMHANS) शामिल थे।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में CBI की जांच की सराहना की और कहा कि उसने बच्चे के क्लास टीचर, ट्यूशन टीचर, स्कूल काउंसलर, घर की मेड और पड़ोसियों सहित कई गवाहों से पूछताछ की। इसने पिता के घर के CCTV फुटेज का भी विश्लेषण किया, जिसमें वह समय शामिल था जब बच्चा उनके साथ रह रहा था।

CBI के आखिरी नतीजे को बताते हुए कोर्ट ने कहा:

“हालांकि हर पहलू अपने आप में आरोपों को गलत साबित करने के लिए काफी नहीं हो सकता है, लेकिन अगर इन सबको एक साथ देखा जाए तो कमेटी का मानना ​​है कि आरोपी के खिलाफ आरोप साबित नहीं होते हैं और यह मामला मुकदमा चलाने लायक नहीं है।”

साइकियाट्रिक जांच में भी यह पाया गया कि माता-पिता के बीच लंबे समय से चल रहा झगड़ा, कस्टडी के लिए चल रहा कानूनी मामला, आरोपों पर बार-बार चर्चा, कई बार मनोवैज्ञानिक सलाह और परिवार की बातों का लगातार असर बच्चे की सोच और कहानी पर पड़ सकता है। साथ ही बच्चे में आरोपों से जुड़े एंग्जायटी या ट्रॉमा के कोई लक्षण नहीं पाए गए।

CBI की जांच के नतीजों को मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पिता के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया और कहा कि कार्यवाही जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल होगा। कोर्ट ने कहा कि CBI रिपोर्ट में “मामले को आगे बढ़ाने लायक नहीं पाया गया, इसलिए 'M' की कस्टडी पाने के लिए माँ-'E' का आधार ही खत्म हो गया।”

'रोजी जैकब बनाम जैकब ए चक्रमकल' मामले में बच्चे के भले का सिद्धांत लागू करते हुए,कोर्ट ने कहा कि बच्चे की कस्टडी और देखरेख पिता के पास ही सबसे अच्छी रहेगी और आदेश दिया कि कानूनी कस्टडी उनके पास रहे। हालांकि, यह देखते हुए कि मार्च 2023 से फिजिकल कस्टडी माँ के पास थी, कोर्ट ने मामले को फैमिली कोर्ट में भेज दिया ताकि बच्चे को पिता के साथ फिर से जोड़ा जा सके। इस प्रक्रिया में जांच में शामिल CBI के दो अधिकारियों और NIMHANS के दो डॉक्टरों की एक्सपर्ट कमेटी मार्गदर्शन करेगी। कमेटी को पूरी तरह से फिर से जोड़ने की प्रक्रिया के दौरान अंतरिम कस्टडी की व्यवस्था तय करने का काम सौंपा गया।

इसके अलावा, कोर्ट ने पिता द्वारा माँ के खिलाफ दर्ज FIR को भी रद्द किया और कहा कि तब से “बहुत कुछ बदल चुका है”। कोर्ट ने दोनों पक्षों और बच्चे को 28 सितंबर को फैसले की कॉपी के साथ फैमिली कोर्ट में पेश होने का भी निर्देश दिया।

Case: 'R' v 'E' & Anr and connected matters

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: