आरोपी ही नहीं, पीड़ित को भी स्पीडी ट्रायल का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश पलटा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्पीडी ट्रायल का अधिकार केवल आरोपी तक सीमित नहीं है बल्कि पीड़ित को भी समय पर न्याय पाने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई में हो रही देरी को लेकर पीड़ित पक्ष का अदालत का दरवाजा खटखटाना गलत नहीं है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें पीड़िता की याचिका खारिज करते हुए उस पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया था।
जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने कहा कि पीड़ित या उसका कानूनी अभिभावक मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाने के लिए याचिका दायर कर सकता है। इसके लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया जा सकता है।
मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 के तहत दर्ज धोखाधड़ी के आरोपों से जुड़ा है। मामले में आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है और सुनवाई न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत में चल रही है। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत को आरोप तय होने के बाद दो साल के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया, लेकिन इसके बावजूद मामले में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई।
अभियोजन पक्ष ने मुकदमे में 22 गवाहों की सूची दी। इनमें से एक गवाह को हटा दिया गया, जबकि 21 गवाह शेष रहे। सुप्रीम कोर्ट के सामने बताया गया कि पहले गवाह से जिरह की प्रक्रिया अभी जारी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि सुनवाई में हो रही देरी को लेकर पीड़िता की चिंता को केवल निराधार या परेशान करने वाली याचिका नहीं माना जा सकता। पीड़ित भी मुकदमे की कार्यवाही से सीधे तौर पर जुड़ा पक्ष है और उसे समय पर न्याय पाने की मांग करने का अधिकार है।
खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से लगाया गया 10 हजार रुपये का जुर्माना रद्द करते हुए निचली अदालत को मुकदमे की सुनवाई तेजी से पूरी करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि 24 सितंबर 2026 से एक साल की अधिकतम समय-सीमा के भीतर मुकदमे का निपटारा किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का विवादित आदेश रद्द किया।