सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक हिंदू विधवा, जिसे 'हिंदू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम, 1937' के तहत अपने मृत पति की संपत्ति में अधिकार मिला है, वह 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956' की धारा 14(1) के तहत उस अधिकार की पूर्ण मालिक बन सकती है, भले ही संपत्ति का कोई बंटवारा न हुआ हो।

कोर्ट ने कहा कि भले ही संपत्ति का बंटवारा न हुआ हो, लेकिन 1956 से पहले पति की मृत्यु पर विरासत में मिली संपत्ति में विधवा का सीमित अधिकार सिर्फ़ इसलिए खत्म नहीं हो जाता कि उसने औपचारिक बंटवारे की मांग नहीं की या उसे हासिल नहीं किया।

'हिंदू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम, 1937' ("1937 अधिनियम") के अनुसार, पति की मृत्यु पर विधवा को मिली संपत्ति में उसे विरासत में मिली संपत्ति पर सीमित अधिकार मिलता है, जिसमें बंटवारे की मांग करने का अधिकार तो होता है, लेकिन मालिकाना हक नहीं होता। 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956' (1956 अधिनियम) के लागू होने पर धारा 14(1) विधवा को विरासत में मिली संपत्ति पर पूर्ण मालिकाना हक देती है, चाहे वह अधिनियम के लागू होने से पहले मिली हो या बाद में, और चाहे विधवा ने बंटवारे की मांग की हो या नहीं।

जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने उस मामले की सुनवाई की, जिसमें वादी-अपीलकर्ताओं ने कर्नाटक हाई कोर्ट की धारवाड़ बेंच के फैसले को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और पहली अपीलीय अदालत के एक जैसे फैसलों को रद्द करते हुए विधवा (जिसका प्रतिनिधित्व प्रतिवादियों ने किया) को उसके पति की 1949 में मृत्यु (यानी हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के लागू होने से पहले) के बाद विरासत में मिली संपत्ति पर पूर्ण मालिकाना हक दिया।

ट्रायल कोर्ट और पहली अपीलीय अदालत ने विधवा को पूर्ण मालिकाना हक देने से इनकार किया था, क्योंकि वह 1937 अधिनियम के तहत विरासत में मिली संपत्ति के बंटवारे की मांग करने में विफल रही थी। लेकिन दूसरी अपील में हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया और विधवा के पूर्ण मालिकाना हक को मान्यता दी, भले ही विधवा ने बंटवारे की मांग की हो या नहीं। हाईकोर्ट के फ़ैसले से नाराज़ होकर वादी (जो विधवा के पति की पहली पत्नी से हुआ बेटा था) ने अपने कानूनी प्रतिनिधियों के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

हाईकोर्ट का फ़ैसला सही ठहराते हुए जस्टिस भट्टी ने 1956 के एक्ट की धारा 14(1) का ज़िक्र करते हुए कहा कि विधवा को विरासत में मिली संपत्ति उसकी पूरी तरह से अपनी संपत्ति बन गई, जिससे 1937 के एक्ट के तहत संपत्ति से जुड़ी पाबंदियां खत्म हो गईं।

कोर्ट ने कहा,

"...एक हिंदू विधवा, अपने पति की जगह लेते हुए 1956 के एक्ट की धारा 14(1) की ज़रूरतों को पूरा करके संपत्ति अपने पास रखती है। भले ही प्रतिवादी (विधवा के कानूनी प्रतिनिधि) उनके द्वारा बताए गए ज़ुबानी बंटवारे की बात साबित न कर पाए हों, फिर भी 1937 के एक्ट और 1956 के एक्ट की धारा 14(1) के तहत कानून का ज़रूरी नतीजा वैसा ही बना रहता है और उस पर कोई असर नहीं पड़ता।"

1956 के एक्ट से पहले विधवा को मिली संपत्ति का बंटवारा पूरी मालिकाना हक का दावा करने के लिए ज़रूरी नहीं

कोर्ट ने कहा कि विधवा और बचे हुए सह-उत्तराधिकारी (कोपार्सनर) के बीच औपचारिक बंटवारा न होने से धारा 14(1) के तहत उसके सीमित अधिकार के पूरी तरह से मालिकाना हक में बदलने में कोई रुकावट नहीं आती।

कोर्ट ने कहा,

"जैसा कि अच्छी तरह से तय हो चुका है, वादी और काशीबाई (विधवा) के बीच बंटवारा होना, मूल मालिक (Prepositus) द्वारा छोड़ी गई संपत्ति के स्वतंत्र या पूर्ण मालिक के तौर पर अधिकार का आनंद लेने के लिए कोई ज़रूरी शर्त नहीं है। भले ही इस तर्क पर फ़ैसला किए बिना यह मान लिया जाए कि अविभाजित संपत्ति का बंटवारा नहीं हुआ है, फिर भी सह-उत्तराधिकार (Coparcenary) में हिस्से घट-बढ़ सकते हैं, लेकिन अधिकार से इनकार नहीं किया जा सकता।"

कोर्ट ने वी. तुलसम्मा बनाम शेषा रेड्डी (1977) और रघुबर सिंह बनाम गुलाब सिंह (1998) में अपने पहले के फ़ैसलों का भी सहारा लिया, जो धारा 14(1) के व्यापक दायरे को मानते हैं। ये फ़ैसले हिंदू महिला के सीमित अधिकार को पूर्ण अधिकार में बदलने की बात करते हैं, बशर्ते वह अधिकार पहले से मौजूद किसी अधिकार से जुड़ा हो।

नतीजतन, अपील खारिज कर दी गई।

Cause Title: GANAPATI (DEAD) BY HIS LRS VERSUS PRABHAKAR & OTHERS

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