आग हादसा नहीं लगती, बीमा कंपनी का 2.4 करोड़ का दावा खारिज करना सही: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने 2.4 करोड़ रुपये के अग्नि बीमा दावे के मामले में न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) का आदेश रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनी ने दावा खारिज करने में उचित कार्रवाई की, क्योंकि बीमित कंपनी ने अपने दावे के समर्थन में गलत घोषणाएं की थीं और पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन किया।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की खंडपीठ ने बीमा कंपनी की अपील मंजूर करते हुए कहा कि मामले के तथ्यों से बीमित कंपनी का दावा गंभीर रूप से कमजोर होता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों को देखते हुए आग के दुर्घटनावश लगने की संभावना पर भी गंभीर संदेह पैदा होता है।
मामला पेपर बोर्ड बनाने वाली एक कंपनी से जुड़ा था, जिसके कारखाने में खुले यार्ड के अलावा तीन गोदाम थे। कंपनी ने न्यू इंडिया एश्योरेंस से दो अग्नि बीमा पॉलिसियां ली थीं। इनमें एक 13 करोड़ रुपये की स्टॉक पॉलिसी थी, जो 30 दिसंबर 2008 से 29 दिसंबर 2009 तक प्रभावी थी, जबकि दूसरी 14 करोड़ रुपये की इमारत, प्लांट और मशीनरी की पॉलिसी थी, जो 28 फरवरी 2009 से 27 फरवरी 2010 तक प्रभावी थी।
मई 2007 में फैक्ट्री के भीतर वेस्ट पेपर यार्ड में आग लगी थी, जिससे कच्चे माल और टिन शेड को नुकसान पहुंचा। कंपनी ने NCDRC के समक्ष करीब 7.31 करोड़ रुपये के नुकसान का दावा किया और 18 प्रतिशत सालाना ब्याज की मांग की।
बीमा कंपनी ने पहले एक प्रारंभिक सर्वेयर नियुक्त किया। उसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि जानबूझकर आग लगाए जाने और काल्पनिक नुकसान की संभावना खारिज करने के लिए मामले की बारीकी से जांच जरूरी है। इसके बाद एक जांच एजेंसी को भी लगाया गया। अंतिम सर्वेयर ने शुद्ध नुकसान 46,09,722 रुपये आंका और कहा कि बीमित कंपनी ने दावा बढ़ाने के लिए अपनी लेखा पुस्तकों में हेरफेर किया। इसके बाद बीमा कंपनी ने पॉलिसी की शर्त संख्या 6 और 8 के उल्लंघन का हवाला देते हुए दावा खारिज किया।
NCDRC ने इसके विपरीत माना कि आग लगने का कारण पता नहीं चला है, इसलिए बीमा कंपनी के लिए आग के कारण या आग की वास्तविकता साबित करना जरूरी नहीं था। आयोग ने यह भी माना कि फायर ब्रिगेड को सूचना देने में जानबूझकर देरी नहीं की गई और दावे पर संदेह करने का कोई आधार नहीं था। NCDRC ने बीमा कंपनी को 45 दिन के भीतर 2.4 करोड़ रुपये ब्याज समेत देने का निर्देश दिया। देरी होने पर 12 प्रतिशत सालाना ब्याज देने को कहा गया। इसके अलावा सेवा में कमी के लिए 3 लाख रुपये और मुकदमे के खर्च के रूप में 1 लाख रुपये भी देने का आदेश दिया गया।
इस आदेश के खिलाफ बीमा कंपनी सुप्रीम कोर्ट पहुंची। बीमित कंपनी ने भी मुआवजे की राशि को लेकर क्रॉस अपील दाखिल की। मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC के आदेश पर रोक लगाते हुए बीमा कंपनी को 50 लाख रुपये जमा करने का निर्देश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबसे पहला सवाल यह है कि क्या बीमा कंपनी दावे को पूरी तरह खारिज करने के लिए उचित थी। अगर इसका जवाब बीमा कंपनी के पक्ष में नहीं होता, तभी नुकसान की राशि के बारे में NCDRC के आकलन पर विचार करने की जरूरत पड़ती। पीठ ने कहा कि मामले के तथ्य बीमित कंपनी के खिलाफ मजबूती से जाते हैं।
पीठ ने बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 64यूएम का भी उल्लेख किया, जिसके तहत 20 हजार रुपये या उससे अधिक के बीमा दावे का आकलन स्वीकृत सर्वेयर से कराया जाना जरूरी है। कोर्ट ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रदीप कुमार और खतेमा फाइबर्स लिमिटेड बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड मामलों का हवाला देते हुए कहा कि सर्वेयर की रिपोर्ट न तो अंतिम और बाध्यकारी होती है और न ही उसे दोनों पक्षों पर स्वतः लागू माना जा सकता है। हालांकि, बीमा कंपनी भी रिपोर्ट को मनमाने तरीके से खारिज नहीं कर सकती।
एक से अधिक सर्वेयर नियुक्त किए जाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने श्री वेंकटेश्वर सिंडिकेट बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड मामले का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि दूसरे सर्वेयर की नियुक्ति के लिए ठोस कारण होना चाहिए। मौजूदा मामले में पहले सर्वेयर ने ही स्पष्ट रूप से आगे जांच की जरूरत बताई थी।
कोर्ट ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम रोशन लाल ऑयल मिल्स लिमिटेड मामले का भी हवाला दिया और कहा कि NCDRC विस्तृत सर्वे रिपोर्ट को नजरअंदाज करने में उचित नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि बीमित कंपनी ने केवल सर्वेयर और जांचकर्ता की नकारात्मक रिपोर्ट का हवाला देते हुए अपनी बेगुनाही बताई, लेकिन सर्वेयर की ओर से वैधानिक आवश्यकताओं के तहत की गई जांच में कोई ठोस कमी नहीं बताई। इसके बावजूद, NCDRC ने दोनों सर्वेयरों की रिपोर्ट नजरअंदाज की, जबकि उन रिपोर्टों में दावे की वास्तविकता पर तथ्यात्मक आधार पर सवाल उठाए गए।
सुप्रीम कोर्ट ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम मुदित रोडवेज, केनरा बैंक बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और ओरियन कॉनमेक्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड मामलों का भी उल्लेख किया। इन फैसलों में कहा गया कि यदि आग लगने का कारण निर्धारित नहीं किया जा सके, तो केवल यह तथ्य अपने आप में निर्णायक नहीं है, बशर्ते बीमित व्यक्ति आग लगाने वाला न हो।
मौजूदा मामले में बीमा कंपनी ने पुलिस रिपोर्ट और एक हलफनामा भी पेश किया, जिसमें कहा गया कि पड़ोसी गन्ने के खेत में जलाई गई आग से निकली चिंगारी यार्ड तक पहुंच सकती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खेत और फैक्ट्री के बीच की दूरी का कोई प्रमाण सामने नहीं आया। तस्वीरों में जली हुई घास का एक हिस्सा हरी घास से घिरा हुआ दिख रहा था और कोर्ट के अनुसार आग की तीव्रता भी बहुत अधिक नहीं लगती थी।
कोर्ट ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि आग लगने की जानकारी मिलने के करीब 50 मिनट बाद फायर ब्रिगेड को सूचना दी गई, जबकि फायर स्टेशन केवल छह से सात किलोमीटर दूर था और करीब 11 मिनट में वहां पहुंच सकता था। खंडपीठ ने कहा कि फैक्ट्री में वाहन मौजूद होने के बावजूद वाइस प्रेसिडेंट ने किसी को तुरंत क्यों नहीं भेजा, इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
रिपोर्टों में यह भी दर्ज था कि कर्मचारियों ने आग बुझाने के बजाय केवल छत या जमीन पर पानी डाला। बीमा कंपनी के शाखा प्रबंधक के पानी का दबाव बढ़ाने और ज्यादा हाइड्रेंट इस्तेमाल करने के अनुरोध पर भी करीब 20 मिनट बाद कार्रवाई की गई। सुप्रीम कोर्ट ने इन परिस्थितियों को इस सवाल के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना कि क्या आग वास्तव में दुर्घटनावश लगी थी और क्या उसे बुझाने के लिए गंभीर प्रयास किए गए थे।
खंडपीठ ने टिन की चादरों और शेड की मुख्य संरचना को हुए सीमित नुकसान का भी उल्लेख किया। आग मुख्य रूप से उस हिस्से में केंद्रित थी, जहां बोरियां रखी थीं। कोर्ट ने कहा कि इससे आगजनी की आशंका और बढ़ती है, क्योंकि इतनी मात्रा में इन बोरियों को कच्चे माल के रूप में खरीदे जाने का कोई हिसाब नहीं था और उनमें रखा सामान काफी पुराना था, जिस पर मकड़ी के जाले तक थे।
टिन की चादरों के बारे में बीमित कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट और जनरल मैनेजर ने कहा था कि आग में वे गिर गई थीं और उन्हें उठाने के लिए जेसीबी बुलाई गई थी। वहीं जेसीबी मालिक ने बताया कि उसने आग लगने से पहले ही शेड को तोड़ने के लिए मशीन भेज दी थी। मजदूरों और आसपास के दुकानदारों ने भी इस बात का समर्थन किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आगजनी की संभावना या आग बुझाने में ईमानदार प्रयासों की कमी के अलावा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन भी ऐसा महत्वपूर्ण पहलू है, जो बीमित कंपनी के खिलाफ जाता है। पॉलिसी की शर्त संख्या 6 के तहत बीमित व्यक्ति को नुकसान के कारण और उत्पत्ति से जुड़ी पूरी जानकारी देनी थी। शर्त संख्या 8 में कहा गया कि यदि दावा धोखाधड़ीपूर्ण हो या उसके समर्थन में गलत घोषणा की गई हो तो पॉलिसी के तहत मिलने वाले सभी लाभ जब्त हो जाएंगे।
खंडपीठ ने पाया कि दोनों शर्तों का उल्लंघन हुआ। कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट और जनरल मैनेजर ने कहा था कि जले हुए टिन शेड में इस्तेमाल योग्य कच्चा माल रखा था। वहीं एक सुपरवाइजर, कर्मचारियों और दो अकाउंटेंटों ने बताया कि वहां केवल अलग करके रखा गया अनुपयोगी वेस्ट पेपर था। कोर्ट ने कहा कि शिकायत के दौरान बीमित कंपनी ने इस साक्ष्य को चुनौती तक नहीं दी। ऐसे में यह संदेह से परे था कि गलत दावा पेश करने की कोशिश की गई।
कोर्ट ने अंतिम सर्वेयर की ओर से कंपनी के खातों को लेकर दर्ज निष्कर्षों पर भी गौर किया। कंपनी में न तो स्टॉक रजिस्टर रखा जाता था और न ही स्टॉक की आवाजाही का रजिस्टर। मई 2008 से यील्ड 87 प्रतिशत से बढ़कर 95 प्रतिशत हो गई। वहीं कच्चे माल और बिक्री का अनुपात 2007-08 में 32.30 प्रतिशत से घटकर 2008-09 में 19.29 प्रतिशत हो गया। कोर्ट ने कहा कि खातों में दर्ज खपत मनमानी पाई गई और दर्ज यील्ड भी काल्पनिक थी।
खंडपीठ ने कहा कि इन सभी तथ्यों को देखते हुए इस मजबूत संभावना को अलग भी कर दें कि आग दुर्घटनावश नहीं लगी थी या कम से कम उसे बुझाने के लिए बीमित कंपनी ने वास्तविक प्रयास नहीं किए, तब भी पॉलिसी की शर्त संख्या 6 और 8 के उल्लंघन के आधार पर बीमा कंपनी की ओर से दावा खारिज किया जाना पूरी तरह उचित था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि NCDRC ने दोनों सर्वेयरों की रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्षों को नजरअंदाज करने और फायर स्टेशन को सूचना देने में देरी नहीं मानने में गलती की। कोर्ट ने बीमा कंपनी की अपील मंजूर करते हुए NCDRC का आदेश रद्द किया और बीमित कंपनी की मुआवजे की राशि बढ़ाने संबंधी अपील भी खारिज की।