सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (22 सितंबर) को कहा कि प्री-ट्रायल स्टेज पर धोखाधड़ी के आरोप को साबित करने के लिए जाली दस्तावेज़ पेश न कर पाना अभियोजन पक्ष (Prosecution) का मामला रद्द करने का कारण नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट जमा करने के बाद भी, ऐसा कोई दस्तावेज़ जो चार्जशीट के साथ जमा नहीं किया गया, उसे बाद में पेश किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा,

"...धोखाधड़ी का आरोप साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष जिस असली दस्तावेज़ पर निर्भर है, उसका न होना ट्रायल के दौरान विचार करने का विषय होगा और केवल उसके न होने के आधार पर पूरे अभियोजन मामले को रद्द नहीं किया जा सकता। दूसरे शब्दों में, अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर आरोप साबित करने की कोशिश कर सकता है। हालांकि, ट्रायल में आरोप साबित करने की कोशिश का मौका दिए बिना पूरी कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती..."

यह टिप्पणी जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच का सिंगल जज का आदेश रद्द करते हुए की। सिंगल जज ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश को पलट दिया था, जिसमें आरोपियों को बरी करने से इनकार किया गया था। मजिस्ट्रेट ने यह इनकार इसलिए किया, क्योंकि धोखाधड़ी से जुड़े कथित अपराध में चार्जशीट जमा करते समय पुलिस ने जाली दस्तावेज़ (यानी सेल डीड) पेश नहीं किया।

सिंगल जज ने बरी होने की मांग करने वाली आरोपियों की रिट याचिका पर सुनवाई की थी, जबकि डिवीज़न बेंच ने उन्हीं आधारों पर आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने के आदेश में दखल देने से इनकार किया था, जो सिंगल बेंच के सामने उठाए गए।

जस्टिस चंदुरकर द्वारा लिखे गए फैसले में शुरुआत में ही पाया गया कि सिंगल जज का आदेश न्यायिक शिष्टाचार और 'इश्यू एस्टॉपेल' (Issue Estoppel) के सिद्धांत के खिलाफ था। कोर्ट ने कहा कि सिंगल जज ने जांच के दायरे से बाहर जाकर अभियोजन पक्ष की सामग्री का फिर से मूल्यांकन किया, जबकि डिवीज़न बेंच पहले ही उसी मुद्दे पर विचार कर चुकी थी।

इसके अलावा, मामले के गुण-दोष के आधार पर कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने चार्जशीट दाखिल करते समय जाली दस्तावेज़ (यानी असली सेल डीड) के न होने के आधार पर आरोपियों को बरी करके गलती की।

कोर्ट ने कहा,

"...सिर्फ़ ओरिजिनल सेल डीड (बिक्री विलेख) न होने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी भी स्थिति में जालसाज़ी (Forgery) का अपराध साबित नहीं किया जा सकता।"

राम शंकर लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1971) मामले में तीन जजों की बेंच के फ़ैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि उचित मामले में जालसाज़ी का अपराध उस दस्तावेज़ को पेश किए बिना भी साबित किया जा सकता है जिसके बारे में जालसाज़ी का आरोप है, बशर्ते सबूतों से कोई उचित संदेह न रह जाए।

कोर्ट ने कहा,

"...राम शंकर लाल (ऊपर उल्लिखित) मामले के फ़ैसले को देखते हुए, जिस दस्तावेज़ के बारे में जालसाज़ी का आरोप है, उसका ओरिजिनल रूप में न होना ही अभियोजन पक्ष (Prosecution) के मामले को पूरी तरह खत्म नहीं कर देता। अभियोजन पक्ष की पूरी सामग्री का मूल्यांकन करने के बाद ही यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि क्या जालसाज़ी का आरोप उचित संदेह से परे साबित हुआ है या नहीं। ट्रायल के अंत में अभियोजन पक्ष के मामले में बरी होने की स्थिति बन सकती है, यह एक बिल्कुल अलग बात है।"

कोर्ट ने आगे कहा,

"दूसरे शब्दों में, रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सबूतों के आधार पर अभियोजन पक्ष जालसाज़ी के अपराध को साबित करने की कोशिश कर सकता है, बशर्ते वह उचित संदेह से परे हो। यह स्वाभाविक रूप से हर मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।"

चार्जशीट के साथ दस्तावेज़ जमा न करने पर बाद में उसे पेश करने से रोक नहीं

कोर्ट ने सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन बनाम आर.एस. पाई, 2002 INSC 178 मामले का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि हालांकि जांच अधिकारी को CrPC की धारा 173(5) के तहत चार्जशीट के साथ संबंधित दस्तावेज़ पेश करने होते हैं, लेकिन ऐसा न करने का मतलब यह नहीं है कि बाद में ऐसी सामग्री पेश नहीं की जा सकती।

आर.एस. पाई मामले में कोर्ट ने यह बात कही,

“यह साफ़ है कि आम तौर पर, इन्वेस्टिगेटिंग ऑफ़िसर को चार्ज-शीट जमा करते समय सभी ज़रूरी दस्तावेज़ पेश करने होते हैं। साथ ही, क्योंकि इसके लिए कोई खास मनाही नहीं है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि बाद में अतिरिक्त दस्तावेज़ पेश नहीं किए जा सकते। अगर रिपोर्ट या चार्ज-शीट जमा करते समय ज़रूरी दस्तावेज़ पेश करने में कोई गलती हो जाती है, तो इन्वेस्टिगेटिंग ऑफ़िसर के पास हमेशा यह विकल्प होता है कि वह कोर्ट की मंज़ूरी से उन्हें पेश कर सके… आम तौर पर, जांच के दौरान इकट्ठा किए गए वे दस्तावेज़ जिन पर प्रॉसिक्यूशन भरोसा करना चाहता है, उन्हें मजिस्ट्रेट के पास भेजना ज़रूरी होता है, लेकिन अगर कोई चूक हो जाती है तो इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी दस्तावेज़ बाद में पेश नहीं किए जा सकते।”

इसके अनुसार, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के सामने क्रिमिनल केस बहाल किया और मजिस्ट्रेट को कानून के मुताबिक ट्रायल आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।

Cause Title: ANTONETTO J D'SOUZA VERSUS ALDILA BRAGANZA AND OTHERS

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