सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार को कोविड-19 महामारी के दौरान सार्वजनिक प्रदर्शन और धरने से जुड़े सांसदों और विधायकों के खिलाफ दर्ज 63 आपराधिक मामलों में अभियोजन वापस लेने की अनुमति दे दी है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने राज्य सरकार की याचिका मंजूर करते हुए कहा कि जहां आरोप गंभीर अपराध या किसी को शारीरिक चोट पहुंचाने से जुड़े नहीं हैं, वहां अभियोजन वापस लेने से इनकार करने का कोई कारण नहीं है।

पहले 15 मामलों में मिली थी अनुमति

इससे पहले हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इनमें से 15 मामलों में अभियोजन वापस लेने की अनुमति दी थी।

राज्य सरकार ने बाकी मामलों में भी अभियोजन वापस लेने की अनुमति मांगी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब आरोपों की प्रकृति गंभीर नहीं है, तो केवल 15 मामलों तक अभियोजन वापसी सीमित रखने का कोई औचित्य नहीं है।

क्या थे आरोप?

ये मामले मुख्य रूप से कोविड महामारी के दौरान सार्वजनिक सभाओं और धरनों के जरिए कोरोना संबंधी नियमों के उल्लंघन से जुड़े थे।

मामलों में IPC की धारा 269, 504 और 506 के साथ-साथ National Disaster Management Act के प्रावधान लगाए गए थे।

पीठ ने गौर किया कि इन मामलों में न तो कोई जघन्य अपराध था और न ही किसी व्यक्ति को शारीरिक चोट पहुंचाने का आरोप।

अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी आदतन या कुख्यात अपराधी नहीं थे, बल्कि जनप्रतिनिधि थे जो सार्वजनिक समस्याओं को उठाने के लिए प्रदर्शन कर रहे थे।

कोर्ट का समय बचाना भी जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन मामलों में अभियोजन जारी रखने से अदालत का महत्वपूर्ण समय खर्च होगा, जबकि इसी समय का इस्तेमाल गंभीर और जरूरी मामलों की जल्द सुनवाई में किया जा सकता है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार के 63 मामलों में अभियोजन वापस लेने के अनुरोध को पूरी तरह मंजूर कर लिया।

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