मृत कर्मचारी की हत्या के आरोपियों को अनुकंपा नौकरी पर रोक का नियम नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को खामी दूर करने को कहा

Update: 2026-06-18 11:23 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार से अनुकंपा नियुक्ति संबंधी नियमों में मौजूद एक महत्वपूर्ण विसंगति को दूर करने पर विचार करने को कहा।

अदालत ने कहा कि वर्तमान नियमों के तहत यदि किसी सरकारी कर्मचारी की हत्या के मामले में उसके परिवार का कोई सदस्य आरोपी हो, तो उसे अनुकंपा वित्तीय सहायता से वंचित किया जा सकता है, लेकिन उसी व्यक्ति को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी मिलने से रोकने का कोई प्रावधान नहीं है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी एक अपील पर सुनवाई के दौरान की।

मामले में अतुल चौहान नामक युवक ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उसके पिता सरकारी स्कूल में शिक्षक थे और उनकी हत्या के मामले में उसकी मां पर साजिश रचने का आरोप लगाया गया। इसी कारण अधिकारियों ने अतुल की अनुकंपा नियुक्ति की मांग लंबित रख दी थी।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सिविल सेवा (अनुकंपा वित्तीय सहायता या नियुक्ति) नियम, 2019 का परीक्षण किया।

अदालत ने पाया कि नियम 23(1) के तहत यदि कोई पात्र पारिवारिक सदस्य सरकारी कर्मचारी की हत्या या हत्या के लिए उकसाने के मामले में आरोपी है तो उसे मिलने वाली अनुकंपा वित्तीय सहायता रोक दी जाती है। लेकिन यही प्रतिबंध अनुकंपा नियुक्ति पर लागू नहीं होता।

अदालत ने कहा,

“नियमों में स्पष्ट विसंगति है। कम महत्व वाली राहत यानी वित्तीय सहायता के लिए तो आपराधिक मुकदमे लंबित रहने पर रोक का प्रावधान है, लेकिन कहीं अधिक बड़े लाभ वाली अनुकंपा नियुक्ति के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। राज्य सरकार को इस विधायी कमी को दूर करने के लिए उचित संशोधन करना चाहिए।”

पीठ ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति केवल आर्थिक सहायता से कहीं अधिक बड़ा लाभ है। वित्तीय सहायता सीमित अवधि तक मिलने वाली मासिक राशि होती है, जबकि अनुकंपा नियुक्ति के जरिए व्यक्ति को स्थायी सरकारी सेवा, नियमित वेतन, पदोन्नति के अवसर, पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवा लाभ प्राप्त होते हैं।

अदालत ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था एक अजीब स्थिति पैदा करती है, जहां किसी व्यक्ति को मृत कर्मचारी की हत्या के मामले में आरोपी होने के कारण वित्तीय सहायता तो नहीं मिलेगी, लेकिन वह उसी दौरान सरकारी नौकरी के लिए पात्र माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह स्थिति प्रशासनिक कठिनाइयों, भ्रम और अनावश्यक मुकदमेबाजी को जन्म दे सकती है।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नीति निर्माण का विषय है और न्यायालय नियमों की व्याख्या करते हुए उनके दायरे का विस्तार नहीं कर सकता। चूंकि नियम 23(1) में केवल वित्तीय सहायता का उल्लेख है, इसलिए अदालत उसे अनुकंपा नियुक्ति तक नहीं बढ़ा सकती।

पीठ ने कहा,

“न्यायालय का काम कानून को उसी रूप में लागू करना है जैसा वह है। नियमों में मौजूद कमियों को दूर करना और आवश्यक संशोधन करना राज्य सरकार तथा नियम बनाने वाले प्राधिकरण का कार्य है।”

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को सुझाव दिया कि वह ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट प्रावधान बनाए, जहां सरकारी कर्मचारी की हत्या या हत्या के लिए उकसाने के मामले में परिवार का कोई सदस्य आरोपी हो और वह अनुकंपा नियुक्ति का दावा कर रहा हो।

अदालत ने यह भी माना कि मौजूदा नियमों में यह एक गंभीर विधायी कमी है, जिसे दूर किए जाने की आवश्यकता है, लेकिन इसका समाधान न्यायिक आदेश के बजाय नियमों में संशोधन के माध्यम से ही संभव है।

Tags:    

Similar News