सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (20.08.2026) को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) की धारा 3(2)(r) और 3(1)(s) के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की। यह मामला स्कूल मैनेजर के खिलाफ दर्ज किया गया, जिस पर दो छात्रों के पिता के साथ मारपीट करने और जातिसूचक गालियां देने का आरोप था। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए मामला रद्द किया कि कथित बातें एक बंद कमरे में कही गईं, जहां आम जनता की पहुंच नहीं थी, इसलिए कानून की ज़रूरी शर्तों को पूरा नहीं किया गया।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। हाईकोर्ट ने SC/ST Act की धारा 14A(1) के तहत अपीलकर्ता की अपील खारिज की थी।

अपीलकर्ता उस स्कूल का मैनेजर था जहां प्रतिवादी (R2) के बेटे पढ़ते थे। दो छात्रों के बीच झगड़े के बाद R2 अपीलकर्ता के पास गया। आरोप है कि अपीलकर्ता ने स्कूल स्टाफ के साथ मिलकर उसके साथ मारपीट की और जातिसूचक गालियां दीं। अपीलकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC, अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 191, 115 और 352) की धारा 147, 323, 342 और 504 और SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत FIR दर्ज की गई। उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई और स्पेशल जज ने मामले का संज्ञान लिया।

गौरतलब है कि उसी दिन अपीलकर्ता की पत्नी ने भी R2 के खिलाफ एक क्रॉस-FIR दर्ज कराई। आरोप था कि R2 ने स्कूल ऑफिस में उसके साथ गाली-गलौज और मारपीट की थी, जिसके बाद अपीलकर्ता ने बीच-बचाव किया और खुद भी मारपीट का शिकार हुआ। R2 के खिलाफ भी चार्जशीट दाखिल की गई और मामले का संज्ञान लिया गया। अपीलकर्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्पेशल जज के समन जारी करने के आदेश को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि यह मामला जवाबी कार्रवाई (counterblast) के तौर पर दर्ज किया गया, इसे रद्द करने का आधार नहीं बनाया जा सकता; और उपलब्ध सबूतों के आधार पर प्रथम दृष्टया (prima facie) मामला बनता है। हाई कोर्ट के इस फ़ैसले से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट के सामने अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने यह मानने में गलती की थी कि घटना सार्वजनिक दृश्यता (public view) वाले स्थान पर हुई थी। यह दलील दी गई कि गवाहों के बयानों से यह साबित नहीं होता कि घटना के समय कमरे के अंदर कोई मौजूद था, और कमरा बंद था, जिसमें न तो कोई खिड़की थी और न ही वहां आम लोगों की पहुंच थी। यह भी कहा गया कि FIR में अपीलकर्ता पर जाति-आधारित अपशब्द कहने का कोई विशिष्ट आरोप नहीं था, और उसे पीड़ित की जाति के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं थी।

इसके विपरीत, प्रतिवादी ने हाईकोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि घटना सार्वजनिक दृश्यता वाले स्थान पर हुई थी और रिकॉर्ड पर ऐसा मामला साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद थे।

SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) पर विचार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुख्य सवाल यह था कि क्या रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से यह पता चलता है कि कथित जाति-आधारित अपशब्द सार्वजनिक दृश्यता वाले स्थान पर कहे गए।

'करुप्पुदयार बनाम राज्य (प्रतिनिधित्व: डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस, लालगुडी, त्रिची) व अन्य' और 'हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य' मामलों में अपने फ़ैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने दोहराया,

"इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि 'सार्वजनिक दृश्यता वाले स्थान' के लिए, वह स्थान खुला होना चाहिए जहां आम लोग आरोपी द्वारा पीड़ित के प्रति कहे गए शब्दों को देख या सुन सकें। यदि कथित अपराध चार दीवारों के भीतर होता है जहां आम लोग मौजूद नहीं हैं, तो यह नहीं कहा जा सकता कि यह सार्वजनिक दृश्यता वाले स्थान पर हुआ है।"

इसे लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि FIR में यह नहीं कहा गया था कि कथित अपशब्द आम लोगों की उपस्थिति या उनकी जानकारी में कहे गए। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि न तो FIR में और न ही R2 (दूसरे प्रतिवादी) के बयानों में जाति-आधारित अपशब्द कहने का कोई विशिष्ट आरोप लगाया गया।

बेंच ने कहा,

"अभियोजन पक्ष ने जिन सबूतों का सहारा लिया, उनसे ज़्यादा-से-ज़्यादा यही पता चलता है कि दोनों पक्षों के बीच झगड़ा और हाथापाई हुई। उनसे अपील करने वाले व्यक्ति द्वारा जाति-आधारित कोई खास बात कहे जाने का पता नहीं चलता।"

गवाहों (स्कूल शिक्षकों) के बयानों की जांच करते हुए कोर्ट ने पाया कि हालांकि उन्होंने "बहस और हाथापाई" का ज़िक्र किया, लेकिन उनमें से किसी ने भी यह नहीं कहा कि वे उस समय वहां मौजूद थे जब कथित तौर पर जाति-आधारित अपशब्द कहे गए या उन्होंने उन्हें सुना।

कोर्ट ने कहा,

"इसलिए स्कूल परिसर में उनकी मौजूदगी मात्र से यह साबित नहीं होता कि कथित बात सार्वजनिक रूप से कही गई।"

बेंच ने साफ़ किया कि हालांकि कोर्ट को मामले का संज्ञान लेने के चरण में सबूतों की बारीकी से जांच करने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन "अपराध के मुख्य तत्व कोर्ट के सामने पेश किए गए सबूतों से सामने आने चाहिए।"

यह मानते हुए कि SC/ST Act के तहत अपराध प्रथम दृष्टया नहीं बनते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया और एक्ट के तहत चल रही कार्यवाही को भी ख़त्म किया। हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि IPC के तहत अपराधों से जुड़ी कार्यवाही जारी रहेगी।

Case : Ramkrishna Chauhan v State of Uttar Pradesh & Anr

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