सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (19 अगस्त) को कहा कि ऑटोमोबाइल डीलरों को बैंकों और इंश्योरेंस कंपनियों से गाड़ी का लोन और इंश्योरेंस पॉलिसी दिलाने के लिए मिलने वाले रेफरल चार्ज पर फाइनेंस एक्ट, 1994 के तहत "बिज़नेस ऑक्सिलरी सर्विस" (व्यावसायिक सहायक सेवा) के तौर पर टैक्स लगेगा।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा,

"आसेसी (टैक्स देने वाला) बैंकों और इंश्योरेंस कंपनी के कारोबार को बढ़ावा दे रहा है, जिसके लिए उन्हें एग्रीमेंट में तय रकम मिलती है।"

ऑटोमोबाइल डीलर TVS मोटर कंपनी लिमिटेड को बैंकों (HDFC बैंक और ICICI बैंक) और इंश्योरेंस कंपनियों (ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी) से 'रेफरल चार्ज' मिले थे। ये चार्ज उन ग्राहकों को रेफर करने के लिए थे जिन्होंने डीलर की मदद से मोटर वाहन लोन लिए और इंश्योरेंस पॉलिसी ली थीं।

डिपार्टमेंट ने फाइनेंस एक्ट, 1994 की धारा 65(105)(zzb) के तहत इन रेफरल चार्ज पर "बिज़नेस ऑक्सिलरी सर्विस" के तौर पर टैक्स लगाने की कोशिश की। आसेसी का तर्क था कि इन चार्ज पर टैक्स नहीं लगता और ऐसी सेवाओं पर टैक्स लगने को लेकर कन्फ्यूजन था।

आसेसी ने शो-कॉज़ नोटिस जारी होने से पहले ही पूरी टैक्स देनदारी चुका दी थी, लेकिन पूरी टैक्स देनदारी चुकाने के बाद 2 अप्रैल, 2008 को जारी शो-कॉज़ नोटिस पर आपत्ति जताई।

जस्टिस चंद्रन के लिखे फैसले में ट्रिब्यूनल के इस निष्कर्ष को सही ठहराया गया कि रेफरल चार्ज पर "बिज़नेस ऑक्सिलरी सर्विस" के तौर पर टैक्स लगता है। कोर्ट ने M/s. पगारिया ऑटो सेंटर बनाम कमिश्नर ऑफ़ सेंट्रल एक्साइज़, औरंगाबाद (2014) मामले में सेंट्रल, एक्साइज़ एंड सर्विस टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (CESTAT) के फैसले का समर्थन किया। इस फैसले में कहा गया कि लोन और इंश्योरेंस दिलाने के लिए ऑटोमोबाइल डीलरों को मिलने वाले रेफरल चार्ज पर "बिज़नेस ऑक्सिलरी सर्विस" के तौर पर टैक्स लगता है।

हालांकि, कोर्ट ने फाइनेंस एक्ट की धारा 78 के तहत लगाया गया जुर्माना रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि शो-कॉज़ नोटिस जारी होने से पहले ही टैक्स देनदारी चुका दी गई और "देनदारी को लेकर कुछ कन्फ्यूजन" था।

अदालत ने कहा,

“देनदारी को लेकर कुछ उलझन थी, इसलिए करदाता ने सर्विस टैक्स रिटर्न में रेफरल चार्ज से हुई कमाई को 'बिज़नेस ऑक्सिलरी सर्विस' के तौर पर नहीं दिखाया था। जिस समय की बात हो रही है, वह 2003-2004 से 2006-2007 तक का है। भले ही बढ़ी हुई समय-सीमा के भीतर नोटिस जारी किया जा सकता था, लेकिन नोटिस जारी होने से पहले ही देनदारी चुका दिए जाने के कारण हम लगाए गए जुर्माने को रद्द करने का आदेश देते हैं। ट्रिब्यूनल के आदेश से पता चलता है कि धारा 76 के तहत लगाया गया जुर्माना ट्रिब्यूनल ने रद्द किया। अब हम निर्देश देते हैं कि धारा 78 के तहत लगाया गया जुर्माना भी रद्द कर दिया जाए।”

Cause Title: M/S TVS MOTOR COMPANY LIMITED Versus COMMISSIONER OF CENTRAL EXCISE, CHENNAI-III

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