राजनीतिक दलों के अनियंत्रित चुनावी खर्च पर रोक की मांग वाली PIL पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र व चुनाव आयोग को नोटिस

Update: 2026-02-27 07:34 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने आज राजनीतिक दलों द्वारा अनियंत्रित चुनावी खर्च के मुद्दे को उठाने वाली जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया। यह याचिका कॉमन कॉज और सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन द्वारा दायर की गई है।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा कि वर्तमान कानून चुनाव के दौरान उम्मीदवारों द्वारा धन के उपयोग पर सीमा तय करता है, लेकिन इन सीमाओं का प्रभावी पालन नहीं होता। उन्होंने बताया कि यदि कोई व्यक्ति उम्मीदवार की ओर से खर्च करता है तो उसे उम्मीदवार के चुनावी खर्च में जोड़ा जाता है, लेकिन राजनीतिक दल द्वारा किए गए खर्च को उम्मीदवार के खर्च में नहीं गिना जाता।

उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक दलों के खर्च पर कोई सीमा निर्धारित नहीं है।

अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने नियामक उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यदि किसी उम्मीदवार के मित्र या समर्थक उसके पक्ष में खर्च करते हैं और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत उचित ठहराते हैं, तो ऐसे खर्च को नियंत्रित करना कठिन हो सकता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी उम्मीदवार को समर्थन देने के लिए बाहरी समूह या मित्र धन खर्च करें, तो उस पर सीमा कैसे लागू होगी। यदि खर्च पर अधिकतम सीमा तय भी कर दी जाए, तो इसे अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उल्लंघन के रूप में चुनौती दी जा सकती है।

चुनावी बांड मामले का हवाला

इस पर प्रशांत भूषण ने चुनावी बांड मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि अनियंत्रित चुनावी खर्च लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है और इसे रोकना आवश्यक है। इसके बाद अदालत ने नोटिस जारी कर दिया।

याचिका में क्या कहा गया

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(a) के तहत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन तथा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि चुनावों में धनबल का बढ़ता प्रभाव चुनावी निष्पक्षता, राजनीतिक समान अवसर और संसदीय लोकतंत्र के प्रतिनिधिक स्वरूप को कमजोर कर रहा है।

याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77(1) और चुनाव आचरण नियमों के नियम 90 का हवाला देते हुए कहा गया है कि उम्मीदवारों के खर्च पर सख्त सीमा है, लेकिन राजनीतिक दलों के खर्च पर ऐसी कोई सीमा नहीं है।

विशेषज्ञ संस्थाओं की सिफारिशें

याचिका में कहा गया है कि विधि आयोग सहित कई विशेषज्ञ निकायों ने इस कानूनी शून्य की ओर ध्यान दिलाया है और राजनीतिक दलों के खर्च को विनियमित करने या उसकी सीमा तय करने की सिफारिश की है, लेकिन अब तक कोई ठोस विधायी या कार्यकारी कदम नहीं उठाया गया।

अंतरराष्ट्रीय उदाहरण

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि अन्य देशों में राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च को नियंत्रित करना संभव और आवश्यक माना गया है। उदाहरण के लिए, यूनाइटेड किंगडम में 'पॉलिटिकल पार्टीज़, इलेक्शंस एंड रेफरेंडम्स एक्ट, 2000' के तहत दलों के अभियान खर्च पर सीमा तय है और उल्लंघन पर दंड का प्रावधान भी है।

संसदीय लोकतंत्र पर प्रभाव

याचिका में यह भी कहा गया है कि अनियंत्रित खर्च के कारण भारतीय चुनावों में “राष्ट्रपति शैली” (Presidentialisation) का प्रभाव बढ़ गया है, जिसमें भारी धनराशि खर्च कर एक ही नेता को केंद्र में रखकर प्रचार किया जाता है। यह संविधान द्वारा स्थापित वेस्टमिंस्टर मॉडल आधारित संसदीय लोकतंत्र की भावना के विपरीत है।

इस प्रकार याचिका में राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च को नियंत्रित करने और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय के हस्तक्षेप की मांग की गई है।

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