अटेंडेंस कम होने पर भी परीक्षा देने की छूट? सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (26 मई) को दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें कहा गया था कि न्यूनतम उपस्थिति (minimum attendance) की कमी के आधार पर किसी भी छात्र को परीक्षा देने से नहीं रोका जा सकता। कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश के पैराग्राफ 249 पर रोक लगाई, जिसमें यह निर्देश दिए गए थे।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए मामले को लंबित याचिकाओं के साथ टैग कर दिया। ये याचिकाएं BCI के उन सर्कुलरों को चुनौती देती हैं, जिनमें विश्वविद्यालयों में बायोमेट्रिक अटेंडेंस, CCTV और छात्रों की आपराधिक पृष्ठभूमि जांच लागू करने की बात कही गई थी।
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी समेत कई वकीलों ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की। रोहतगी ने कहा कि यह फैसला छात्रों को अनुशासन से बचने का “खुला लाइसेंस” देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के दृष्टिकोण पर चिंता जताई। जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि छात्र इस फैसले को कक्षाओं में न आने के “फ्री पास” की तरह देखेंगे। उन्होंने पूछा, “अगर छात्र क्लास में नहीं आएंगे तो फिर उन्होंने एडमिशन क्यों लिया?”
जस्टिस विक्रम नाथ ने भी सवाल किया कि यदि छात्र पढ़ाई के लिए कक्षाओं में ही नहीं आएंगे तो विश्वविद्यालयों में शिक्षक क्या करेंगे।
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह आदेश एक छात्र की आत्महत्या से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान दिया था।
हाईकोर्ट ने कहा था कि न्यूनतम उपस्थिति के कारण किसी छात्र को परीक्षा देने, अगली सेमेस्टर में जाने या करियर प्रगति से नहीं रोका जा सकता। साथ ही कॉलेजों को छात्रों की उपस्थिति सुधारने के लिए वैकल्पिक उपाय अपनाने के निर्देश दिए गए थे।
हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन निर्देशों पर रोक लगा दी है और मामले की आगे सुनवाई जारी रहेगी।