डांस बार, स्पा और सैलून में बाल श्रम पर रोक की मांग, सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस

Update: 2026-05-25 10:15 GMT

बाल श्रम पर सख्ती की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। याचिका में ऑर्केस्ट्रा, डांस बार, डांस ट्रूप, नौटंकी कार्यक्रम, मसाज पार्लर, स्पा और सैलून जैसे मनोरंजन एवं आतिथ्य क्षेत्र से जुड़े प्रतिष्ठानों में बच्चों के रोजगार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है, जहां बच्चों के शोषण और तस्करी का खतरा बताया गया है।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पांचोली की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। यह जनहित याचिका 'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस' की ओर से दायर की गई है। सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि यह “गंभीर मुद्दा” है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का पेश हुए।

याचिका में केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह Child and Adolescent Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986 (बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986) की धारा 4 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए उन व्यवसायों की सूची का विस्तार करे, जहां बच्चों के रोजगार पर पूर्ण प्रतिबंध हो। याचिका के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को ऑर्केस्ट्रा, डांस बार, नौटंकी, स्पा, मसाज पार्लर और इसी तरह के प्रतिष्ठानों में काम या प्रदर्शन कराने को कानून की अनुसूची के भाग-A में शामिल किया जाए, ताकि इन क्षेत्रों में बाल श्रम पर पूरी तरह रोक लग सके।

याचिका में यह भी मांग की गई कि वर्तमान में अनुसूची के भाग-B में शामिल 'मसाज पार्लर, जिमनेजियम, मनोरंजन केंद्र और चिकित्सा सुविधाओं' को भाग-A में स्थानांतरित किया जाए। इससे इन क्षेत्रों में बाल श्रम के लिए केवल नियमन नहीं, बल्कि पूर्ण प्रतिबंध लागू हो जाएगा।

इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने National Commission for Protection of Child Rights (राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग) को ऐसे प्रतिष्ठानों में काम करते पाए गए बच्चों के रेस्क्यू और पुनर्वास के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का निर्देश देने की भी मांग की है।

याचिका में कहा गया है कि मौजूदा कानूनी ढांचे में कई खामियां हैं, जिनके कारण बच्चों को ऐसे क्षेत्रों में काम पर लगाया जा रहा है जहां यौन शोषण, मानव तस्करी और उत्पीड़न का गंभीर खतरा बना रहता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा और पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान और संस्थागत व्यवस्था आवश्यक हैं। 

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