S.33(1)(a) आर्बिट्रेशन एक्ट सिर्फ़ अवार्ड में क्लर्कियल गलतियां सुधारने के लिए, इसका इस्तेमाल ब्याज की प्रकृति बदलने के लिए नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
यह मानते हुए कि गलतियां सुधारने की आड़ में आर्बिट्रल अवार्ड के मूल तत्व को बदला नहीं जा सकता, सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि दिए गए ब्याज की प्रकृति को साधारण ब्याज से बदलकर चक्रवृद्धि ब्याज करना एक बड़ा बदलाव माना जाएगा, जो आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 33(1)(a) के सीमित दायरे से बाहर है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने यह फ़ैसला गुजरात वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड द्वारा दायर उन अपीलों को मंज़ूर करते हुए सुनाया, जो गुजरात हाईकोर्ट के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ थीं, जिसमें एक कमर्शियल कोर्ट के उस फ़ैसले को सही ठहराया गया, जिसने सरयू प्लास्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में एक आर्बिट्रल अवार्ड में बदलाव किया।
कोर्ट ने माना कि कमर्शियल कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया, जब उसने मुक़दमे के दौरान दिए गए साधारण ब्याज को चक्रवृद्धि ब्याज से बदल दिया। इस बदलाव से बोर्ड की देनदारी लगभग 30.38 करोड़ रुपये से बढ़कर 144.93 करोड़ रुपये हो गई।
बेंच की ओर से लिखते हुए जस्टिस आलोक अराधे ने टिप्पणी की कि दिए गए ब्याज की प्रकृति आर्बिट्रेटर के फ़ैसले का एक मूल पहलू है, न कि कोई क्लर्कियल गलती जिसे सुधारा जा सके।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"ब्याज के तरीक़े का निर्धारण—चाहे वह साधारण हो या चक्रवृद्धि—आर्बिट्रेटर द्वारा मामले की निष्पक्षता के आकलन का मूल आधार है। यह मामले के गुण-दोष पर एक ठोस निर्णय को दर्शाता है। यह न तो लिखने में हुई कोई चूक है, न ही कोई अनजाने में हुई गणितीय गलती, और न ही कोई क्लर्कियल भूल।"
कोर्ट ने आगे कहा कि आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 33 का दायरा केवल गणना, टाइपिंग या क्लर्कियल गलतियों को सुधारने तक ही सीमित है। इसे आर्बिट्रल अवार्ड की समीक्षा करने या उसे दोबारा लिखने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
बेंच ने कहा,
"एक्ट की धारा 33(1)(a) आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल को अवार्ड में किसी भी गणना, क्लर्कियल या टाइपिंग संबंधी गलती को सुधारने की सीमित शक्ति प्रदान करती है। यह प्रावधान न तो अवार्ड में कोई बड़ा बदलाव करने के लिए, और न ही उसमें दर्ज निष्कर्षों के गुण-दोष की समीक्षा करने के लिए बनाया गया।"
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद गुजरात जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड द्वारा 1998 और 2002 के बीच सरयू प्लास्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड को PVC पाइपों की आपूर्ति के लिए दिए गए अनुबंधों से उत्पन्न हुआ। बाद में एक आंतरिक ऑडिट में अनियमितताओं और PVC आपूर्तिकर्ताओं को कथित तौर पर अधिक भुगतान किए जाने की बात सामने आई, जिसके बाद बोर्ड ने 2003 में कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया।
एक दशक से भी अधिक समय बाद अप्रैल 2012 में दोनों पक्षों ने अपने विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता समझौता किया। तीन वर्षों से अधिक समय तक चली लंबी मध्यस्थता कार्यवाही के बाद अक्टूबर 2015 में एकमात्र मध्यस्थ ने कंपनी के दावों को आंशिक रूप से स्वीकार किया और 1.01 करोड़ रुपये का अवार्ड (निर्णय) दिया, जिसमें बकाया राशि और मूल्य वृद्धि (Escalation) के दावे शामिल थे। इस अवार्ड में मुकदमे के दौरान की अवधि (pendente lite period) के लिए 21.675% प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज देने का प्रावधान था, जबकि चक्रवृद्धि ब्याज केवल अवार्ड की तारीख से लेकर वास्तविक भुगतान की तारीख तक के लिए ही दिया गया।
इसके बाद सरयू प्लास्टिक्स ने यह तर्क दिया कि मध्यस्थ का इरादा मुकदमे के दौरान की अवधि के लिए भी चक्रवृद्धि ब्याज देने का ही था, और निर्णय के मुख्य भाग में साधारण ब्याज का उल्लेख एक त्रुटि थी, जिसे मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 33 के तहत ठीक किया जाना आवश्यक है; यह धारा गणना संबंधी, लिपिकीय या टंकण संबंधी गलतियों को सुधारने की अनुमति देती है।
हालांकि, आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने इस अनुरोध पर कोई फ़ैसला नहीं दिया। उस समय तक गुजरात जल आपूर्ति बोर्ड ने कमर्शियल कोर्ट में अवार्ड को चुनौती देते हुए धारा 34 के तहत पहले ही कार्यवाही शुरू की थी। फरवरी 2016 में आर्बिट्रेटर ने कंपनी के धारा 33 के आवेदन पर विचार करने से यह देखते हुए इनकार किया कि चूंकि धारा 34 के तहत कार्यवाही पहले से ही कमर्शियल कोर्ट में लंबित थी, इसलिए इस मुद्दे पर वहीं विचार किया जाना चाहिए।
इसके बाद कंपनी ने कमर्शियल कोर्ट का रुख किया, और असल में वही राहत मांगी। कमर्शियल कोर्ट ने आखिरकार अपने रिव्यू अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया और आर्बिट्रल अवार्ड में बदलाव करते हुए 'पेंडेंटे लाइट' (मुकदमे के दौरान) अवधि के लिए भी साधारण ब्याज की जगह चक्रवृद्धि ब्याज लागू किया, और इसे एक सुधारा जा सकने वाला त्रुटि माना। इससे अवार्ड के वित्तीय परिणामों में काफ़ी बदलाव आया, और बोर्ड की देनदारी लगभग 30.38 करोड़ रुपये से बढ़कर 144.93 करोड़ रुपये हो गई। गुजरात हाईकोर्ट ने बाद में इस कार्रवाई को सही ठहराया, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
कमर्शियल कोर्ट द्वारा अपनाए गए तरीके को अस्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
"इसलिए कमर्शियल कोर्ट ने अधिनियम की धारा 33(1)(a) के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करने का दिखावा करते हुए इस तरह के बदलाव का निर्देश देकर स्पष्ट रूप से अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया। कमर्शियल कोर्ट के रिव्यू अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल ऐसा परिणाम पाने के लिए नहीं किया जा सकता, जो धारा 33(1)(a) द्वारा स्पष्ट रूप से दी गई सीमित सुधार शक्तियों के तहत भी अनुमेय नहीं था। इसके विपरीत कोई भी फ़ैसला देना, धारा 33 को रिव्यू और अपीलीय सुधार का एक ज़रिया बना देगा, जो स्पष्ट रूप से अधिनियम की योजना और उस पर की गई लगातार न्यायिक व्याख्या के विपरीत है।"
Cause Title: GUJARAT WATER SUPPLY AND SEWERAGE BOARD VERSUS SARYU PLASTICS PVT. LTD.