पिछली तारीख से टैक्स की देनदारी सही, लेकिन जुर्माना नहीं : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही कानूनी संशोधन के ज़रिए पिछली तारीख से टैक्स की देनदारी सही तरीके से लागू की जा सकती है, लेकिन किसी डीलर पर पिछली तारीख से जुर्माना नहीं लगाया जा सकता, जिसने उस समय कानून का पालन किया था जब लेन-देन हुआ था।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने यह अंतर तब स्पष्ट किया, जब उन्होंने कर्नाटक सेल्स टैक्स एक्ट, 1957 में 2001 के संशोधन की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी। इस संशोधन ने चीनी पर मिलने वाली छूट को पिछली तारीख से केवल "भारत में उत्पादित या निर्मित" चीनी तक सीमित कर दिया।
कोर्ट ने माना कि कर्नाटक सरकार के पास छूट को पिछली तारीख से वापस लेने का अधिकार है और संशोधन से पैदा होने वाली मुख्य टैक्स देनदारी की वसूली की जा सकती है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि जिन डीलरों ने उस समय लागू कानून के तहत सामान पर छूट होने के कारण टैक्स नहीं वसूला, उन पर बाद में सिर्फ़ इसलिए जुर्माना नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि विधायिका ने कानूनी स्थिति को पिछली तारीख से बदल दिया।
बेंच ने कहा,
"मुख्य टैक्स देनदारी की वैधता एक बात है। जुर्माना लगाना दूसरी बात है। जुर्माने के लिए गलती, चूक, जानबूझकर नियम तोड़ने या कम से कम मौजूदा दायित्व का पालन न करने की ज़रूरत होती है। किसी ऐसे डीलर पर जुर्माना लगाना निष्पक्षता के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ होगा, जिसने टैक्स इसलिए नहीं वसूला, क्योंकि कानून, न्यायिक समझ और विभाग के अपने आकलन में उस सामान को छूट के दायरे में माना गया... इसलिए सही संतुलन यह है कि संशोधन की वैधता बरकरार रखी जाए और मुख्य टैक्स देनदारी तय करने की अनुमति दी जाए, लेकिन पिछली तारीख से लागू होने वाले नियम को सजा देने वाला रूप लेने से रोका जाए।"
मामले की पृष्ठभूमि
2001 से पहले, कर्नाटक सेल्स टैक्स एक्ट में घरेलू और आयातित चीनी के बीच कोई अंतर किए बिना "चीनी" को टैक्स से छूट दी गई। अपीलकर्ताओं ने 1994-1996 के बीच चीनी का आयात किया और यह मानते हुए कि इस पर छूट है, खरीदारों से टैक्स नहीं वसूला। टैक्स विभाग ने शुरू में इसे स्वीकार कर लिया और छूट देते हुए आकलन पूरा किया। उन्होंने 'स्टेट ऑफ़ केरल बनाम स्टेट ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आधार लिया, जिसमें कहा गया कि छूट वाली एंट्री में एक्साइज़ कानून का ज़िक्र केवल सामान की पहचान के लिए था और यह मूल स्थान (ओरिजिन) के आधार पर कोई सीमा तय नहीं करता।
2001 में कर्नाटक एक्ट नंबर 5 के ज़रिए "चीनी" शब्द के बाद "भारत में उत्पादित या निर्मित" शब्द जोड़े गए, जिन्हें पिछली तारीख से लागू किया गया। इसके बाद पिछली अवधियों के लिए टैक्स, पेनल्टी और ब्याज के साथ फिर से असेसमेंट (Reassessment) की कार्यवाही शुरू की गई। एक सिंगल जज ने इसे पिछली तारीख से लागू करने (Retrospective Operation) का फैसला रद्द किया, लेकिन डिवीज़न बेंच ने इसे सही ठहराया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई।
अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार के फैसले में फिर से असेसमेंट की कार्यवाही को तो सही ठहराया गया, लेकिन पिछली तारीख से पेनल्टी लगाने के फैसले को गलत माना गया।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए हम यह मानते हैं कि कानून के अनुसार मुख्य टैक्स देनदारी तय करने के लिए फिर से असेसमेंट की कार्यवाही जारी रह सकती है। हालांकि, संशोधन से पहले की अवधि के लिए कोई पेनल्टी नहीं लगाई जाएगी और न ही वसूली जाएगी। अगर कानून के तहत ब्याज लगाया जा सकता है तो वह इस फैसले को लागू करने के बाद फिर से असेसमेंट के तहत की गई कानूनी मांग की तारीख से ही लगेगा, न कि मूल लेन-देन या मूल असेसमेंट अवधि की तारीख से।"
कोर्ट ने ब्याज के मामले में भी यही सिद्धांत अपनाया।
हालांकि ब्याज आमतौर पर नुकसान की भरपाई के लिए होता है, लेकिन बेंच ने कहा कि जब देनदारी ही पिछली तारीख से बनती है और टैक्सपेयर बिक्री के समय टैक्स वसूल नहीं कर सकता, तो मूल लेन-देन की तारीख से ब्याज वसूलने से पिछली तारीख से लगाए गए टैक्स का स्वरूप सजा देने जैसा हो जाएगा।
इसलिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर ब्याज लगाया जा सकता है तो वह फिर से असेसमेंट के तहत की गई कानूनी मांग की तारीख से ही लगेगा, न कि मूल लेन-देन या असेसमेंट अवधि की तारीख से।
फ़ैसले के निष्कर्ष:
i. कर्नाटक एक्ट नंबर 5, 2001 से पहले इम्पोर्ट की गई चीनी कर्नाटक सेल्स टैक्स एक्ट, 1957 की पांचवीं अनुसूची में "चीनी" से जुड़ी छूट वाली एंट्री के दायरे में आती थी।
ii. कर्नाटक एक्ट नंबर 5, 2001 के तहत "चीनी" शब्द के बाद "भारत में उत्पादित या निर्मित" शब्द जोड़ना (पिछली तारीख से लागू मानते हुए), राज्य की विधायी क्षमता के दायरे में है और संवैधानिक रूप से वैध है।
iii. यह संशोधन केवल स्पष्टीकरण देने वाला नहीं है। यह असल में उस छूट को सीमित करता है, जो पहले इम्पोर्ट की गई चीनी पर मिलती थी। हालांकि, पिछली तारीख से लागू होने वाली ऐसी पाबंदी अपने आप में असंवैधानिक नहीं है।
iv. सिंगल जज का संशोधन के पिछली तारीख से लागू होने वाले हिस्से को पूरी तरह से रद्द करना सही नहीं था।
v. डिवीज़न बेंच का संशोधन की वैधता को सही ठहराना तो सही था, लेकिन पिछली तारीख से लागू होने के कारण होने वाले जुर्माने और दमनकारी नतीजों से करदाताओं को बचाए बिना दोबारा असेसमेंट की कार्यवाही को बहाल करना उनकी गलती थी।
vi. राज्य कानूनी तरीके से दोबारा असेसमेंट और दोबारा गणना करने के बाद अगर कोई मूल टैक्स देनदारी बनती है, तो उसे तय करने और वसूलने का हकदार है।
vii. कर्नाटक एक्ट नंबर 5, 2001 से पहले किए गए लेन-देन के संबंध में कोई जुर्माना नहीं लगाया जाएगा और न ही वसूला जाएगा।
viii. अगर कानून के तहत ब्याज लगाया जा सकता है तो उसकी गणना इस फ़ैसले को लागू करने के बाद दोबारा असेसमेंट के आधार पर कानूनी मांग की तारीख से ही की जाएगी।
ix. कोर्ट ने कहा, "अंतर-राज्यीय बिक्री से संबंधित किसी भी दोबारा असेसमेंट की गणना सेंट्रल सेल्स टैक्स एक्ट, 1956 (जिसमें सेक्शन 8(2) भी शामिल है, जहाँ भी लागू हो) के अनुसार सख्ती से की जाएगी।"
Cause Title: ASIA SUGAR & CHEMICAL CO., DEVANGERE VERSUS THE STATE OF KARNATAKA & ORS.