S.142 NI Act | बोर्ड प्रस्ताव पर दस्तखत करने का मतलब यह नहीं कि डायरेक्टर को कंपनी के रोज़मर्रा के मामलों की जानकारी थी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि सिर्फ़ बोर्ड प्रस्ताव पर दस्तखत करने से यह साबित नहीं होता कि कोई डायरेक्टर कंपनी के रोज़मर्रा के मामलों का इंचार्ज था और उनके लिए ज़िम्मेदार था> इसलिए सिर्फ़ इस आधार पर नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
कंपनी की डायरेक्टर की अपील मंज़ूर करते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने चेक बाउंस मामले में उनके खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द की। बेंच ने कहा कि ऐसा कोई खास आरोप नहीं था जिससे यह साबित हो कि कंपनी के कामकाज में उनकी कोई सक्रिय भूमिका थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला NI Act की धारा 138 और 142 के तहत शिकायत से जुड़ा है। कंपनी ने लोहा और स्टील के भुगतान के लिए तीन चेक जारी किए, जो इस आधार पर बाउंस हो गए कि चेक जारी करने वाले के दस्तखत अलग थे और चेक में कुछ बदलाव किए गए। इसके बाद एक कानूनी नोटिस भेजा गया और फिर मजिस्ट्रेट ने कंपनी और उसके डायरेक्टरों के खिलाफ समन जारी किए।
अपीलकर्ता कंपनी की डायरेक्टरों में से एक थीं। उसने इस समन आदेश को चुनौती दी। रिविजनल कोर्ट और हाईकोर्ट ने कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि बोर्ड प्रस्ताव पर उनके दस्तखत से यह पता चलता है कि वह कंपनी के रोज़मर्रा के मैनेजमेंट में शामिल थीं।
सिर्फ़ डायरेक्टर होना या प्रस्ताव पर दस्तखत करना काफ़ी नहीं
हाईकोर्ट का तर्क खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि NI Act की धारा 141 के तहत किसी डायरेक्टर की जवाबदेही तय करने के लिए यह खास तौर पर बताना ज़रूरी है कि संबंधित समय पर वह व्यक्ति कंपनी के कामकाज का इंचार्ज था और उसके लिए ज़िम्मेदार था।
इस संदर्भ में N. Vijay Kumar बनाम Vishwanath Rao N. (2025 INSC 537), K.S. Mehta बनाम Morgan Securities & Credits (P) Ltd और Hitesh Verma बनाम Health Care at Home (India) (P) Ltd. मामलों में दिए गए फ़ैसलों का हवाला दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि बोर्ड प्रस्ताव पर आम तौर पर डायरेक्टर बड़े नीतिगत फ़ैसलों के लिए दस्तखत करते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें रोज़मर्रा के कामकाज से जुड़ी लेन-देन की जानकारी थी या वे उनमें शामिल थे। कोर्ट ने फैसला दिया कि कंपनी के रोज़मर्रा के मामलों में अपीलकर्ता की भूमिका के बारे में कोई सीधा आरोप न होना ही अभियोजन पक्ष के लिए सबसे बड़ी कमज़ोरी साबित हुई।
बेंच ने आगे कहा,
"बोर्ड रिज़ॉल्यूशन ऐसा दस्तावेज़ है, जिस पर बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के सदस्य उन फ़ैसलों या नतीजों के लिए हस्ताक्षर करते हैं, जो बोर्ड के सामने विचार और फ़ैसले के लिए रखे गए मामलों पर लिए गए हों। इसमें अन्य बातों के अलावा, मैनेजमेंट लेवल पर कर्मचारियों की भर्ती, कंपनी की संपत्ति और देनदारियों की कुल स्थिति पर असर डालने वाली संपत्तियों का अधिग्रहण या परिसमापन, या कोई अन्य ऐसा बड़ा दिशा-निर्देश संबंधी मुद्दा शामिल हो सकता है। हालांकि, इसका किसी भी तरह से यह मतलब नहीं है कि बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स का हर एक सदस्य, किसी कारोबारी संस्था को चलाने में शामिल रोज़मर्रा के लेन-देन में लिए गए सभी फ़ैसलों से अवगत हो।"
बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी व्यक्ति का पदनाम केवल 'डायरेक्टर' के तौर पर तय कर देने भर से ही वैधानिक ज़रूरत पूरी नहीं हो जाती, और यह कि बिना किसी ठोस तथ्यात्मक दावे के, किसी पर 'मानित दायित्व' (Deemed Liability) नहीं थोपा जा सकता।
अदालत ने यह भी पाया कि शिकायत में अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ ऐसा कोई सीधा आरोप नहीं था कि वह कंपनी के कामकाज की प्रभारी थी, या उसके लिए ज़िम्मेदार थी।
रिविज़न के बाद भी CrPC की धारा 482 के तहत याचिका पर कोई रोक नहीं
अदालत ने हाईकोर्ट के इस विचार से भी असहमति जताई कि एक बार जब कोई 'रिविज़न याचिका' (पुनरीक्षण याचिका) दायर कर दी जाती है तो उसी आधार पर 'दंड प्रक्रिया संहिता' (CrPC) की धारा 482 के तहत बाद में कोई और याचिका दायर करने पर रोक लग जाती है।
पहले के फ़ैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने यह स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट की 'अंतर्निहित शक्तियां' (Inherent Powers) न्याय के साथ किसी भी तरह की नाइंसाफ़ी को रोकने के लिए हमेशा उपलब्ध रहती हैं। उन्हें केवल इस आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता कि पहले 'रिविज़न क्षेत्राधिकार' का इस्तेमाल किया जा चुका है।
यह मानते हुए कि अपीलकर्ता पर मुक़दमा चलाने के लिए ज़रूरी शर्तें पूरी नहीं हो रही थीं, सुप्रीम कोर्ट ने उसके ख़िलाफ़ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि अदालत की ये टिप्पणियां केवल अपीलकर्ता के मामले तक ही सीमित रहेंगी, और अन्य आरोपियों के ख़िलाफ़ चल रहे मुक़दमे पर इनका कोई असर नहीं पड़ेगा।
Case : Saroj Pandey v. Govt of NCT of Delhi