बिजली का झटका लगने से हुई मौतों के लिए बिजली बोर्ड पर सख्त जवाबदेही लागू होती है, पूर्ण जवाबदेही नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि बिजली का झटका लगने से हुई मौतों या चोटों के लिए बिजली अधिकारियों को 'स्ट्रिक्ट लायबिलिटी' (सख्त जवाबदेही) के तहत जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, लेकिन ऐसी जवाबदेही को बिना किसी अपवाद के 'एब्सोल्यूट लायबिलिटी' (पूर्ण जवाबदेही) नहीं माना जा सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट की सिंगल और डिवीजन बेंच के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन को बिजली का झटका लगने से हुई मौतों के लिए 'एब्सोल्यूट लायबिलिटी' (पूर्ण जवाबदेही) के लिए जिम्मेदार ठहराया गया।
यह फैसला बिजली का झटका लगने की दो घटनाओं से जुड़ा है: एक घटना में 11 KV ट्रांसमिशन लाइन के संपर्क में आने से एक व्यक्ति की मौत हो गई थी, और दूसरी घटना में क्रिकेट की गेंद लेने की कोशिश करते समय 66 KV लाइन के संपर्क में आने से एक अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया।
कोर्ट ने माना कि बिजली का झटका लगने के मामलों में 'स्ट्रिक्ट लायबिलिटी' (सख्त जवाबदेही) ही सही पैमाना है, न कि 'एब्सोल्यूट लायबिलिटी' (पूर्ण जवाबदेही)।
कोर्ट ने कहा,
"हमारी सोच यह है कि 'स्ट्रिक्ट लायबिलिटी' (सख्त जवाबदेही) लागू करना ज़्यादा सही होगा, क्योंकि हर मामले में यह नहीं कहा जा सकता कि बिजली बोर्ड ही जिम्मेदार हैं। बिजली का ट्रांसमिशन निस्संदेह अपने आप में खतरनाक काम है। जो लोग ऐसा खतरनाक काम करते हैं, उन्हें ही इसकी जिम्मेदारी उठानी चाहिए और राज्य भी इस नियम से अलग नहीं है। ऐसे संस्थान नुकसान बांटने के तरीके (लॉस डिस्ट्रीब्यूशन मैकेनिज्म) पर काम करते हैं, यानी वे बीमा या ज़्यादा कीमतों के ज़रिए हुए नुकसान की भरपाई करने की सबसे अच्छी स्थिति में होते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि उनसे इन संभावनाओं को ध्यान में रखने की उम्मीद की जाती है। इन्हीं कारणों से वे घायल या मृतक को मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार हैं, भले ही उनकी कोई गलती न हो, बशर्ते कि मामले में 'स्ट्रिक्ट लायबिलिटी' के नियम के अपवाद लागू न हों।"
बता दें, 'स्ट्रिक्ट लायबिलिटी' (सख्त जवाबदेही) में सामान्य नियम यह है कि जब कोई व्यक्ति अपनी ज़मीन पर ऐसी कोई चीज़ लाता है या जमा करता है, जिससे नुकसान होने की संभावना हो और अगर वह चीज़ बाहर निकल जाती है तो वह व्यक्ति उससे होने वाले सभी स्वाभाविक परिणामों के लिए जिम्मेदार होता है। [देखें Rylands v. Fletcher, (1868) LR 3 HL 330]
इसके विपरीत, 'एब्सोल्यूट लायबिलिटी' (पूर्ण जवाबदेही), जैसा कि नाम से ही पता चलता है, एक ऐसी जवाबदेही है जिसमें इससे बचने या छूट पाने की कोई गुंजाइश नहीं होती। आसान शब्दों में कहें तो, जिस व्यक्ति को 'पूरी तरह से ज़िम्मेदार' (Absolutely Liable) माना गया है, वह उस ज़िम्मेदारी के लिए जवाबदेह होगा, चाहे हालात या परिस्थितियाँ कुछ भी हों जिनके कारण उस पर यह आरोप लगाया गया है। यह नियम सिर्फ़ कंपनियों या उद्यमों पर लागू होता है और तब काम आता है, जब कोई कंपनी किसी ऐसे काम में लगी हो जो स्वभाव से ही खतरनाक या जोखिम भरा हो, और उस काम को करने के दौरान हुए किसी हादसे से किसी को नुकसान पहुँचा हो। इस मामले में सबसे अहम उदाहरण 'ओलियम गैस लीक केस' (M.C. Mehta v. Union of India) में संविधान पीठ का फ़ैसला है, जिसमें दिल्ली में स्थित श्रीराम फूड्स एंड फर्टिलाइजर्स की एक औद्योगिक इकाई से ओलियम गैस लीक हुई थी, जिससे इलाके के लोगों की जान को खतरा पैदा हो गया।
जस्टिस भगवती ने ओलियम गैस लीक केस में कहा,
"इसलिए हमारा मानना है कि जब कोई कंपनी किसी खतरनाक या स्वभाव से जोखिम भरे काम में लगी हो और उस काम को करने के दौरान हुए किसी हादसे (जैसे ज़हरीली गैस का रिसाव) से किसी को नुकसान पहुंचे तो कंपनी उन सभी लोगों को मुआवज़ा देने के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार होगी जो उस हादसे से प्रभावित हुए हैं। यह ज़िम्मेदारी 'रायलैंड्स बनाम फ्लेचर' (Rylands v. Fletcher) के नियम के तहत 'सख्त ज़िम्मेदारी' (strict liability) के सिद्धांत से जुड़े किसी भी अपवाद के अधीन नहीं होगी।"
बिजली का झटका लगने से हुई मौत के लिए मुआवज़ा पाने के लिए हाईकोर्ट में रिट याचिकाएं दायर की गईं। हाईकोर्ट ने तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों को नज़रअंदाज़ करते हुए रिट याचिकाओं को मंज़ूरी दी और मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की तर्ज़ पर मल्टीप्लायर मेथड का इस्तेमाल करके दावेदारों को मुआवज़ा दिया।
हाईकोर्ट के फ़ैसले से असंतुष्ट होकर कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
अपील को मंज़ूरी देते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फ़ैसले में सबसे पहले हाईकोर्ट के सामने रिट याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया गया, क्योंकि इसमें तथ्यों से जुड़ा एक विवादित सवाल शामिल था।
कोर्ट ने कहा,
"...चूंकि इसमें तथ्यों से जुड़े विवादित सवाल शामिल हैं, इसलिए हमारी राय है कि प्रतिवादी द्वारा मुआवज़े के लिए दायर की गई रिट याचिका स्वीकार्य नहीं थी।"
इसके अलावा, कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा मोटर वाहन अधिनियम के मल्टीप्लायर मेथड को लागू करने पर भी सवाल उठाया, क्योंकि यह बिजली अधिनियम, 2003 पर लागू नहीं होता है।
कोर्ट ने कहा,
"...बिजली का झटका लगने के मामलों में मुआवज़ा तय करने के लिए मल्टीप्लायर मेथड लागू नहीं किया जा सकता है। चूंकि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत गणना का तरीका मल्टीप्लायर पर निर्भर करता है, इसलिए उसके तहत की जाने वाली प्रक्रिया को बिजली का झटका लगने के मामलों में उसी तरह लागू नहीं किया जा सकता, जैसा कि हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में किया। यह कानून की बात है कि बिजली अधिनियम, 2003 में मुआवज़े की गणना करने का कोई तरीका नहीं बताया गया। इसमें केवल धारा 57 के तहत कुछ स्थितियों में लाइसेंसधारी की मुआवज़ा देने की ज़िम्मेदारी के बारे में बताया गया, लेकिन इसकी गणना करने के तरीके के बारे में कुछ नहीं कहा गया।"
पूर्ण दायित्व (एब्सोल्यूट लायबिलिटी) के सिद्धांत के लागू होने के मुद्दे पर कोर्ट ने अलग राय रखी और कहा कि बिजली का झटका लगने के मामलों में सख्त दायित्व (स्ट्रिक्ट लायबिलिटी) का सिद्धांत लागू होगा।
कोर्ट ने कहा,
"प्रभाकरण विजया कुमार मामले में की गई टिप्पणियों से हमारी इस राय को समर्थन मिलता है, जिसमें साफ़ तौर पर कहा गया कि राईलैंड्स (ऊपर ज़िक्र किया गया) का नियम कई अलग-अलग तरह के मामलों पर लागू होता है, जिनमें बिजली से जुड़े मामले भी शामिल हैं।"
ऊपर बताई गई बातों के आधार पर अपील को मंज़ूरी दी गई और संबंधित फ़ोरम के सामने अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ उपलब्ध वैकल्पिक उपायों का सहारा लेने की अनुमति दी गई।
Cause Title: KARNATAKA POWER TRANSMISSION CORPORATION LIMITED VERSUS REKHA & ORS.
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