S. 197 CrPC | मंजूरी की ज़रूरत का बाद में विस्तार उस समय लिए गए संज्ञान को अमान्य नहीं करेगा, जब कोई रोक नहीं थी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (1 अप्रैल) को कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत मंजूरी सुरक्षा का बाद में किया गया विस्तार, उन कार्यवाहियों को रोकने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जो उस समय शुरू की गई थीं, जब ऐसी कोई रोक मौजूद नहीं थी।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कलकत्ता पुलिस बल के अधीनस्थ अधिकारी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को सही ठहराया। इस अधिकारी के खिलाफ अपराध का संज्ञान उस समय लिया गया था, जब कलकत्ता पुलिस के सभी अधीनस्थ अधिकारियों को CrPC की धारा 197 का लाभ नहीं दिया गया।
बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि चूंकि कथित अपराध होने की तारीख (वर्ष 2000 में) को अपीलकर्ता पर मुकदमा चलाने के लिए किसी मंजूरी की ज़रूरत नहीं थी, इसलिए बाद में जारी की गई अधिसूचना (2010 में जारी) - जो अपीलकर्ता को CrPC की धारा 197 का लाभ देती है - पहले से शुरू हो चुकी कार्यवाही रद्द नहीं कर सकती।
कोर्ट ने कहा,
"...किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अपराध का संज्ञान लेने पर बाद में लगाई गई रोक, उन कार्यवाहियों को अमान्य नहीं करेगी जो उस समय शुरू हो चुकी थीं जब सरकारी कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए किसी मंजूरी की ज़रूरत नहीं थी।"
फखरूज़म्मा बनाम झारखंड राज्य, (2013) 15 SCC 552 के अनुसार, केवल उन्हीं सरकारी कर्मचारियों पर मुकदमा चलाने के लिए पहले से मंजूरी की ज़रूरत होती है, जिन्हें सरकार हटा सकती है। चूंकि अपीलकर्ता एक पुलिस थाने का प्रभारी अधिकारी था। उसको सरकार सीधे तौर पर नहीं हटा सकती, इसलिए कोर्ट ने कहा कि वह CrPC की धारा 197 का लाभ नहीं ले सकता। वह 2010 में जारी की गई उस बाद की अधिसूचना पर भरोसा नहीं कर सकता, जो कलकत्ता पुलिस के सभी अधीनस्थ पुलिस कर्मियों को CrPC की धारा 197 का लाभ देती है।
यह मामला 2001 में दायर आपराधिक शिकायत से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया कि तीन पुलिस अधिकारी शिकायतकर्ता के पति की हिरासत में हत्या में शामिल थे। जिस समय मजिस्ट्रेट ने अपराध का संज्ञान लिया, उस समय कांस्टेबल और स्टेशन-स्तर के अधिकारियों जैसे अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों को CrPC की धारा 197 के तहत सुरक्षा प्राप्त नहीं थी; इस धारा के तहत कुछ सरकारी कर्मचारियों पर मुकदमा चलाने के लिए सरकार की पहले से मंज़ूरी ज़रूरी होती है।
लगभग एक दशक बाद 19 नवंबर, 2010 को, पश्चिम बंगाल सरकार ने धारा 197(3) के तहत एक अधिसूचना जारी की, जिसके द्वारा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में शामिल अधीनस्थ पुलिस रैंकों को भी मंज़ूरी की सुरक्षा प्रदान की गई। इस अधिसूचना का हवाला देते हुए आरोपी अधिकारियों ने यह तर्क दिया कि उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही बिना पहले से मंज़ूरी के जारी नहीं रह सकती और उन्होंने मामले को रद्द करने की मांग की।
हाईकोर्ट का फैसला सही ठहराते हुए जस्टिस मिश्रा द्वारा लिखे गए फैसले में यह टिप्पणी की गई कि धारा 197 की प्रयोज्यता (लागू होने) को निर्धारित करने के लिए सबसे अहम बात वह तारीख है, जिस दिन अपराध का संज्ञान लिया गया था, न कि कानून में बाद में हुए बदलाव।
कोर्ट के अनुसार, एक बार जब ऐसी किसी रोक के अभाव में अपराध का संज्ञान वैध रूप से ले लिया जाता है तो बाद में हुए कानूनी बदलाव उक्त कार्यवाही रद्द नहीं कर सकते।
कोर्ट ने कहा,
"...ये अधिसूचनाएं उन कार्यवाहियों पर कोई असर नहीं डालेंगी, जिनमें संज्ञान लेते समय कोई रोक नहीं थी।"
साथ ही इस बात को दोहराया,
"अपीलकर्ताओं को धारा 197 का लाभ प्राप्त नहीं है।"
तदनुसार, अपील खारिज कर दी गई।
Cause Title: SAMARENDRA NATH KUNDU & ANR. VERSUS SADHANA DAS & ANR.